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हीट वेव, प्रतिचक्रवात एवं ग्लोबल वार्मिंग की परस्पर क्रिया

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चर्चा में क्यों?

वर्ष 2023 में अल-नीनो का प्रभाव कम होने से विश्व ग्रसित स्थित में है हाल ही में भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पूर्वी भारत और गंगा के मैदान के व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली हीट वेव की स्थिति की चेतावनी जारी की है।

  • यह इस चुनौती को समझने पर प्रकाश डालता है कि ग्लोबल वार्मिंग स्थानीय मौसम को कैसे प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त, प्रतिचक्रवात की उपस्थिति स्थिति को और अधिक जटिल बना देती है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में हीट वेव की गंभीरता बढ़ जाती है।

ग्लोबल वार्मिंग में हीट वेव की क्या भूमिका है?

  • हीट वेव जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है, जो  जीवाश्म ईंधन जलने से और बढ़ती है, यह हीट वेव वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों (GHG) के स्तर में वृद्धि करती है।
    • ये गैसें अत्यधिक उष्ण ऊर्जा को रोकती हैं, जिससे औसत तापमान में वृद्धि होती है।
  • मानव गतिविधियों से होने वाले GHG उत्सर्जन ने पूर्व-औद्योगिक काल से पृथ्वी को लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है।
    • इस गर्म आधार रेखा का मतलब है कि अत्यधिक गर्मी की घटनाओं के दौरान उच्च तापमान तक पहुँचा जा सकता है।
  • ग्लोबल वार्मिंग के कारण विभिन्न क्षेत्रों में तापमान में असमान परिवर्तन होता है, जिससे हीट वेव में स्थानीय भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
    • कुछ क्षेत्रों में शीत तापमान का अनुभव होने के बाद भी, ग्लोबल वार्मिंग ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न कर सकती है जो भूमि उपयोग और भूगोल से प्रभावित होकर स्थानीय स्तर पर हीट वेव को तीव्र कर सकती हैं।
  • हीट वेव के सटीक पूर्वानुमान और कुशल शमन के लिये इन क्षेत्रीय प्रभावों को समझना महत्त्वपूर्ण है।

प्रतिचक्रवात क्या है?

  • उच्च दाब प्रणाली: प्रतिचक्रवात उच्च वायुमंडलीय दाब के क्षेत्र हैं, जो चक्रवातों (निम्न दाब) के विपरीत हैं।
  • पवन परिसंचरण: पृथ्वी के घूर्णन (कोरिओलिस प्रभाव) के कारण उत्तरी गोलार्द्ध  में एक प्रतिचक्रवात के चारों ओर पवनें दक्षिणावर्त और दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्त चलती हैं।
  • साफ आसमान और शांत मौसम: प्रतिचक्रवात निम्न पवन और साफ आसमान के साथ स्थिर, शांत स्थिति लाते हैं।
  • शुष्क पवन: प्रतिचक्रवातों में अवशोषित होने वाली पवनें उष्ण हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वह शुष्क हो जाती है, जिससे न्यून वर्षा और आर्द्रता देखने को मिलती है।
  • ग्रीष्मकालीन बनाम शीतकालीन प्रभाव: ग्रीष्मकालीन प्रतिचक्रवात उष्ण और धूपयुक्त हो सकते हैं, जबकि शीतकालीन प्रतिचक्रवात सुबह के समय साथ ठंडे व साफ हो सकते हैं।

 

प्रतिचक्रवात ताप से क्यों संबंधित हैं?

  • प्रतिचक्रवात और ताप:
    • प्रतिचक्रवात अपनी दृढ़ता और शक्ति के माध्यम से ताप से जुड़े होते हैं।
    • भारतीय पूर्वी-जेट (IEJ) और एक शक्तिशाली पश्चिमी जेट पूर्व मानसून मौसम में हिंद महासागर तथा भारतीय उपमहाद्वीप पर एक प्रतिचक्रवाती दशाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
      • एक शक्तिशाली प्रतिचक्रवात भारत के कई भागों में शुष्क और गर्म मौसम ला सकता है, जबकि एक क्षीण/कमज़ोर प्रतिचक्रवात आने पर मौसम आर्द्र हो जाता है।
      • IEJ मध्य क्षोभमंडल में तीव्र पूर्वी पवनों की एक संकीर्ण बेल्ट है जो पूर्व मानसून मौसम (मार्च-मई) के दौरान प्रायद्वीपीय भारत और निकटवर्ती दक्षिण हिंद महासागर में चलती है।
        • यह अफ्रीकी पूर्वी-जेट (AEJ) से क्षीण और आकार में सूक्ष्म होता है।
        • AEJ पश्चिम अफ्रीका के निचले क्षोभमंडल में होता है। यह पूर्वी हवाओं की विशेषता है और ग्रीष्मकाल के समय सबसे प्रमुख है।
        • इसका निर्माण शुष्क सहारा रेगिस्तान और शीत गिनी की खाड़ी के बीच तापमान के अंतर के कारण हुआ है।
  • मौसम के प्रकृति पर प्रतिचक्रवातों का प्रभाव:
    • भारत में प्रबल IEJ वर्षों के दौरान निकट-सतह तापमान उच्च और मौसम शुष्क होता है, जबकि क्षीण IEJ वर्षों के दौरान तापमान ठंडा तथा मौसम आद्रतापूर्ण होता है।
    • किसी विशेष वर्ष में प्रतिचक्रवात की तीव्रता यह निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण कारक है कि क्या यह उष्ण लहरों और ग्लोबल वार्मिंग से संबंधित है।
      • भारतीय उपमहाद्वीप पर अल-नीनो के प्रभाव से तीव्र तथा निरंतर प्रतिचक्रवात उत्पन्न होते हैं, जो लंबे समय तक चलने वाली और अधिक तीव्र हीट वेव्स उत्पन्न करते हैं।
    • मौसम की सटीक भविष्यवाणी तथा पूर्व चेतावनियों के लिये ठंडे मौसमी तापमान तथा तीव्र एवं निरंतर प्रतिचक्रवात की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।
  • प्रतिचक्रवातों का हालिया प्रभाव:
    • मार्च 2024 में ओडिशा में असामान्य वर्षा के लिये उत्तर हिंद महासागर पर हालिया प्रतिचक्रवाती परिसंचरण उत्तरदायी थे। दक्षिणावर्त एवं अवतालित वायु (sinking air) वाले प्रतिचक्रवात, उच्च दबाव वाले ताप गुंबद बना सकते हैं।
      • अप्रैल 2024 में दुबई में आई बाढ़ में भी  इस घटना का योगदान हो सकता है।

पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ: 

  • ग्लोबल वार्मिंग के लिये सटीक पूर्व-चेतावनी प्रणालियाँ तीन-चरणीय पद्धति का उपयोग करती हैं जिसे ‘रेडी-सेट-गो’ प्रणाली कहा जाता है।
  • यह पद्धति विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अंतर्गत विश्व जलवायु अनुसंधान कार्यक्रम के ‘सबसीज़नल-टू-सीज़नल पूर्वानुमान (S 2 S)’ परियोजना का भाग है।
    • भारत इस परियोजना में भाग ले रहा है तथा भारत ने S2S परियोजना में भारी निवेश किया है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (NDMA) के कुशल और प्रभावी कार्यन्वयन के मार्गदर्शन हेतु  तीन-चरणीय पद्धति बहुत महत्त्वपूर्ण है।
    • ‘रेडी’ चरण ग्लोबल वार्मिंग तथा अल नीनो जैसे बाहरी कारकों के आधार पर एक मौसमी संभावना प्रदान करता है।
    • ‘सेट’ चरण में दो से चार सप्ताह पूर्व बताई जा सकने वाली उप-मौसमी भविष्यवाणियाँ, संसाधन आवंटन में योगदान तथा संभावित हॉटस्पॉट की पहचान शामिल है।
    • ‘गो’ चरण लघु और मध्यम-श्रेणी के मौसम पूर्वानुमानों पर आधारित है और इसमें आपदा प्रतिक्रिया प्रयासों का प्रबंधन शामिल है।
  • हालाँकि,चुनौती स्थानीय स्तर पर मौसम की भविष्यवाणी करने में है। यद्यपि 10 साल की अवधि में होने वाले मौसम परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने के प्रयास चल रहे हैं।
    • विभिन्न स्तरों पर समन्वय और पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित किये जा रहे हैं, जिसके लिये सरकारों, विभागों तथा जनता के प्रशिक्षण एवं सहयोग की आवश्यकता है।
  • इन प्रणालियों की सफलता भारत के सतत् आर्थिक विकास के लिये  महत्त्वपूर्ण है।

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