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संसद टीवी विशेष: CAR T-सेल थेरेपी

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चर्चा में क्यों ? 

हाल ही में भारत के राष्ट्रपति ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे में आयोजित एक कार्यक्रम में कैंसर के उपचार के लिये स्वदेशी रूप से विकसित CAR T-सेल थेरेपी को एक महत्त्वपूर्ण सफलता बताया।

 

CAR T-सेल थेरेपी क्या है?

  • परिचय: 
    • CAR T-सेल थेरेपी, जिसे काइमेरिक एंटीजेन रिसेप्टर T-सेल थेरेपी के रूप में भी जाना जाता है, एक प्रकार की इम्यूनोथेरेपी है जिसमें कैंसर से लड़ने के लिये रोगी की ही प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
    • CAR T-सेल थेरेपी को ल्यूकेमिया (श्वेत रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करने वाली कोशिकाओं से उत्पन्न होने वाला कैंसर) और लिम्फोमा (लसीका प्रणाली से उत्पन्न होने वाला कैंसर) के लिये अनुमोदित किया गया है।
    • CAR T-सेल थेरेपी को प्रायः ‘लिविंग ड्रग्स’ के रूप में संदर्भित किया जाता है।
    • वर्ष 2017 से, छह CAR T-सेल थेरेपी को खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा अनुमोदित किया गया है।
    • सभी को रक्त कैंसर के उपचार के लिये अनुमोदित किया गया है, जिसमें लिम्फोमा, ल्यूकेमिया के कुछ रूप और मल्टीपल माइलोमा शामिल हैं।
  • प्रक्रिया: 
    • यह एक जटिल एवं वैयक्तिकृत उपचार प्रक्रिया है जिसमें शामिल हैं:
      • T-कोशिकाओं का संग्रह: T-कोशिका/सेल एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है जो संक्रमण से लड़ने में मदद करती है, इसे एफेरेसिस नामक प्रक्रिया के माध्यम से रोगी के रक्त से लिया जाता है।
      • जेनेटिक इंजीनियरिंग: प्रयोगशाला में T-कोशिकाओं को आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है ताकि उनकी सतह पर काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (Chimeric Antigen Receptor- CAR) नामक एक विशेष प्रोटीन को प्रकट किया जा सके।
        • यह CAR कैंसर कोशिकाओं पर पाए जाने वाले एक विशिष्ट एंटीजन (सूचक) की पहचान करने तथा उसके साथ संगठित होने के लिये परिकल्पित किया गया है।
      • प्रसार: संशोधित T-कोशिकाएँ प्रयोगशाला में बड़ी संख्या में द्विगुणित होती हैं।
      • संचार: इन द्विगुणित CAR T-कोशिकाओं को रोगी के रक्तप्रवाह में पुनः संचरित कर दिया जाता है, जहाँ वे लक्षित एंटीजन को उत्पन्न करने वाली कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर सकती हैं तथा उन पर हमला कर सकती हैं।

 

  • भारत में विकास: NexCAR19, B-कोशिका कैंसर के लिये एक स्वदेशी रूप से विकसित थेरेपी है, जिसे इम्यूनोएक्ट (ImmunoACT), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT-B) और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल द्वारा सहयोगात्मक रूप से विकसित किया गया है।
    • कुछ विशिष्ट प्रकार के रक्त कैंसर के उपचार हेतु इस थेरेपी के व्यावसायिक उपयोग को अक्तूबर 2023 में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) द्वारा अनुमोदित किया गया था।
    • NexCAR19, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से अनुमोदन प्राप्त करने वाली पहली CAR-T सेल थेरेपी है।

 

  • CAR-T थेरेपी के संभावित लाभ:
    • उच्च सुधार दर: एडवांस कैंसर से ग्रसित कुछ रोगियों, जिन पर अन्य उपचारों का प्रभाव नहीं पड़ा है, के लिये CAR-T थेरेपी पूर्णतः सुधार की उच्च दर का कारण बन सकती है।
    • लक्षित उपचार: CAR T-सेल थेरेपी अत्यधिक लक्षित है, क्योंकि यह विशेष रूप से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए लक्षित एंटीजन को प्रकट करने वाली कैंसर कोशिकाओं की ही पहचान करती है और उन पर हमला करती है। उपचार में इस तरह की परिशुद्धता पारंपरिक कीमोथेरेपी और विकिरण चिकित्सा (Radiation Therapy) की तुलना में कम दुष्प्रभावों के साथ अधिक प्रभावी उपचार प्रदान कर सकती है।
    • उच्च प्रभावकारिता:  CAR T-सेल थेरेपी ने विशेष रूप से कुछ प्रकार के रक्त कैंसर जैसे एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL), क्रोनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया (CLL) और गैर-हॉजकिन लिंफोमा (NHL) से ग्रसित रोगियों में उल्लेखनीय प्रभावकारिता प्रदर्शित है। इसने कुछ रोगियों में पूर्णतः सुधार की उच्च दर प्राप्त की है जिन पर अन्य उपचारों का कोई प्रभाव नहीं देखा गया था।
    • एकल उपचार: कई मामलों में,  CAR T-सेल थेरेपी में आनुवंशिक रूप से संशोधित T कोशिकाओं का एक ही बार रक्त संचरण में प्रवेश कराना शामिल होता है, जो दीर्घकालिक चिकित्सीय प्रभाव प्रदान कर सकता है। यह कीमोथेरेपी जैसे अन्य उपचारों से भिन्न है, जिसके लिये विस्तारित अवधि में थेरेपी के कई चरण आवश्यक हो सकते हैं।
    • वैयक्तिकृत चिकित्सा:  CAR T-सेल थेरेपी को प्रत्येक रोगी के लिये उनकी कैंसर कोशिकाओं पर मौजूद विशिष्ट एंटीजन को लक्षित करने हेतु संशोधित T कोशिकाओं द्वारा तैयार किया जा सकता है। यह वैयक्तिकृत दृष्टिकोण विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार व ट्यूमर की विविधता को नियंत्रित करता है।

कैंसर क्या है?

  • कैंसर एक व्यापक शब्द है जिसका उपयोग शरीर में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि और प्रसार से होने वाले रोगों के एक समूह का वर्णन करने के लिये किया जाता है।
  • ये असामान्य कोशिकाएँ, जिन्हें कैंसर कोशिकाएँ कहा जाता है, आस-पास के ऊतकों और अंगों पर आक्रमण कर सकती हैं, जिससे उनका सामान्य कार्य बाधित होता है।
  • इसके अतिरिक्त, कैंसर कोशिकाएँ अपररूपांतरण (metastasize) कर सकती हैं, अथवा रक्तप्रवाह या लसीका प्रणाली के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में फैल सकती हैं, जिससे मूल स्थान से दूर शरीर के अन्य भागों में ट्यूमर बन सकते हैं।

जीन थेरेपी क्या है?

  • परिचय:
    • जीन थेरेपी एक चिकित्सकीय दृष्टिकोण है जिसका उद्देश्य रोगी की कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ को संशोधित करके रोगों का उपचार या रोकथाम करना है।
    • इस तकनीक में किसी रोग का कारण बनने वाले दोषपूर्ण जीन को प्रतिस्थापित करने या कोशिकाओं को एक नया कार्य प्रदान करने के लिये किसी व्यक्ति की कोशिकाओं में आनुवंशिक तत्त्व की पहचान कर उन्हें शामिल करना है।
    • जीन थेरेपी द्वारा आनुवंशिक विकारों की एक विस्तृत शृंखला, जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और कुछ प्रकार के कैंसर का उपचार किया जा सकता है।
  • जीन थेरपी के प्रकार :
    • जीन रिप्लेसमेंट थेरेपी: इसमें दोषपूर्ण या अनुपस्थित जीन को प्रतिस्थापित करने के लिये कोशिकाओं में जीन की एक स्वस्थ प्रतिकृति का समावेश शामिल है।
    • जीन एडिटिंग: CRISPR-Cas9 जैसी तकनीकें जीन की सटीक एडिटिंग को सक्षम बनाती हैं, जिनकी सहायता से उत्परिवर्तन में सुधार या जीन अभिव्यक्ति में संशोधन किया जा सकता है।
    • जीन परिवर्द्धन: कुछ मामलों में, कोशिकाओं को अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने या लाभकारी प्रोटीन का उत्पादन करने में मदद करने के लिये जीन को परिवर्द्धित किया जा सकता है।
    • जीन साइलेंसिंग: इस पद्धति में कुछ जीनों की अभिव्यक्ति को बाधित करना शामिल है जो स्मॉल इंटरफेरिंग RNA (siRNA) या एंटीसेंस ऑलिगोन्यूक्लियोटाइड्स जैसे अणुओं को समाविष्ट करके रोग का कारण बन सकते हैं।

वेक्टर क्या है?

  • परिचय: जीन थेरपी में, वेक्टर सामान्यतः एक विषाणु/वायरस या प्लास्मिड होता है जिसे चिकित्सीय जीन को लक्षित कोशिकाओं में प्रवेश कराने या पहुँचाने के लिये संशोधित किया जाता है।
    • जीन थेरेपी में उपयोग किये जाने वाले वायरल वेक्टर के उदाहरणों में लेंटिवायरस, एडेनोवायरस और एडेनो-एसोसिएटेड वायरस (AAVs) शामिल हैं।
      • इनका उपयोग आमतौर पर प्रयोगशालाओं और प्रयोगात्मक जीन थेरेपी दृष्टिकोण में किया जाता है।
    • प्लास्मिड वैक्टर को इलेक्ट्रोपोरेशन या प्रत्यक्ष इंजेक्शन जैसी विधियों के माध्यम से लक्षित कोशिकाओं में प्रवेश कराया जा सकता है।
      • वायरल वेक्टर: वायरल वेक्टर विषाणुओं से उत्पन्न होते हैं जिन्हें आनुवंशिक रूप से इस प्रकार विकसित किया जाता है कि उनकी रोग उत्पादक क्षमता को समाप्त हो जाए लेकिन कोशिकाओं को संक्रमित करने व आनुवंशिक पदार्थ को शरीर में पहुँचाने की उनकी क्षमता बनी रहे।
      • प्लास्मिड वेक्टर: प्लास्मिड वेक्टर छोटे, गोलाकार DNA अणु हैं जो किसी मेज़बान कोशिका के भीतर स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतिकृति बना सकते हैं।

CAR T-सेल थेरेपी से संबंधित चुनौतियाँ कौन-सी हैं?

  • साइटोकीन रिलीज़ सिंड्रोम (CRS): CRS का तात्पर्य प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिक्रिया से है जिसमें CAR-T कोशिकाओं के सक्रिय होने तथा प्रसारित होने के परिणामस्वरूप शरीर में सूजन होना शामिल है।
    • इसके लक्षणों में हल्के, फ्लू जैसे लक्षणों से लेकर तेज़ बुखार, निम्न रक्तचाप और अंगों की शिथिलता आदि शामिल हैं। गंभीर मामलों में, यदि तुरंत उपचार न किया जाए तो CRS जानलेवा भी हो सकता है।
  • साइटोपेनिया: CAR-T सेल थेरेपी के परिणामस्वरूप साइटोपेनिया हो सकता है, जिसमें लाल रुधिर कणिकाओं के स्तर में कमी (एनीमिया),  श्वेत रुधिर कणिकाओं में कमी (न्यूट्रोपेनिया) तथा प्लेटलेट्स में कमी (थ्रोम्बोसाइटोपेनिया) शामिल है।
    • इन स्थितियों से संक्रमण, रक्तस्राव और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।
  • इम्यून इफेक्टर सेल-एसोसिएटेड सिंड्रोम (ICANS): ICANS में CAR-T सेल थेरेपी से जुड़े कई न्यूरोलॉजिकल लक्षण शामिल हैं, जिनमें भ्रम, वाचाघात और उद्वेग (दौरे) शामिल हैं। ICANS, CRS के साथ ही या इससे अलग भी हो सकता है और इसके लिये प्रभावी देख-रेख व हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।
  • ट्यूमर लाइसिस सिंड्रोम (TLS): कुछ मामलों में, CAR T- सेल थेरेपी के बाद कैंसर कोशिकाओं के तेज़ी से नष्ट होने से रक्तप्रवाह में अंतःकोशिकीय पदार्थ मुक्त हो सकता है, जिससे हाइपरकेलेमिया, हाइपरयुरिसीमिया और एक्यूट किडनी इंजरी जैसी चयापचय संबंधी विषमताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

आगे की राह 

  • लागत में कमी:
    • CAR T- सेल थेरेपी की उच्च लागत को कम करने के लिये रणनीतियाँ बनाई जानी चाहिये, जैसे निर्माताओं के साथ मूल्य निर्धारण समझौतों पर बातचीत करना, मूल्य-आधारित कीमत निर्धारण मॉडल लागू करना और विनिर्माण प्रक्रियाओं को अनुकूलित करने तथा दक्षता बढ़ाने के लिये अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना आदि।
  • साइटोकीन रिलीज़ सिंड्रोम (CRS) का प्रबंधन:
    • CRS की शीघ्र पहचान एवं उपचार हेतु मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित किये जाने चाहिये, जिसमें सूजन जैसी प्रतिक्रिया को कम करने के लिये प्रतिरक्षादमनकारी (Immunosuppressive) दवाओं (जैसे टोसीलिज़ुमैब) का उपयोग शामिल है।
    • CRS की पहचान और प्रबंधन के संबंध में स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के शिक्षण एवं प्रशिक्षण में सुधार किया जाना चाहिये, जिसमें गहन निगरानी और समय पर उपचार का महत्त्व भी शामिल है।
  • साइटोपेनियास का प्रबंधन:
    • CAR T- सेल थेरेपी से जुड़े साइटोपेनिया के जोखिम को कम करने के लिये सहायक देखभाल उपाय (उदाहरण हेतु, रक्त आधान, विकास कारक) जैसी रणनीतियों को लागू किया जाना चाहिये, तथा खुराक (Dose) का ऑप्टिमाइजेशन किया जाना चाहिये ताकि चिकित्सीय प्रभावकारिता बनाए रखते हुए हेमटोलोगिक विषाक्तता को कम किया जा सके।
  • इम्यून इफ़ेक्टर सेल-एसोसिएटेड सिंड्रोम (ICANS) का प्रबंधन:
    • ICANS के मूल्यांकन एवं प्रबंधन के लिये मानकीकृत दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिये, जिसमें लक्षण के अनुसार राहत के लिये न्यूरोलॉजिकल निगरानी एवं उपचार (जैसे, कॉर्टिकोस्टेरॉइड) शामिल हैं।
    • ICANS के अंतर्निहित तंत्र को बेहतर ढंग से समझने के लिये अनुसंधान में निवेश किया जाना चाहिये और जोखिम स्तरीकरण एवं  शीघ्र उपचार का मार्गदर्शन करने हेतु पूर्वानुमानित जैवसूचक की पहचान की जानी चाहिये।
  • ट्यूमर लाइसिस सिंड्रोम (TLS) की रोकथाम व उपचार:
    • TLS की रोकथाम एवं शीघ्र निदान हेतु प्रोटोकॉल लागू किया जाना चाहिये, जिसमें जलयोजन (हाइड्रेशन) रणनीतियों और यूरेट-कम करने वाले कारकों का उपयोग शामिल है।
    • CAR T- सेल थेरेपी के दौरान TLS के लक्षणों के लिये रोगियों की नज़दीकी निगरानी की जानी चाहिये और चयापचय संबंधी विषमताओं को कम करने एवं गुर्दे की समस्याओं को रोकने के लिये त्वरित उपचार उपलब्ध किया जाना चाहिये।

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