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शहरीकरण

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चर्चा में क्यों?

भारत के शहरी क्षेत्रों को हाल ही में तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के कारण जल के अभाव, तापन और आधारभूत अवसंरचना पर अत्यधिक बोझ जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

शहरीकरण क्या है?

  • परिचय:
    • शहरीकरण व्यक्तियों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों (देहात) से शहरी क्षेत्रों (कस्बों और शहरों) में प्रवास करने का प्रक्रम है। यह प्रवृत्ति सदियों से जारी है किंतु हाल के दशकों में इसमें तेज़ी आई है।
    • संयुक्त राष्ट्र द्वारा शहरीकरण की पहचान चार जनसांख्यिकीय मेगा-प्रवृत्तियों में से एक के रूप में की जाती है जिसमें अन्य तीन प्रवृत्तियाँ जनसंख्या वृद्धि, काल प्रभावन (Ageing) और अंतर्राष्ट्रीय प्रवास हैं।
  • प्रकार:
    • नियोजित बसाव: भारत के शहरी परिदृश्य में नियोजित बस्तियाँ सरकारी अभिकरणों अथवा  आवासन सोसायटियों द्वारा आधिकारिक रूप से अनुमोदित योजनाओं के अनुसार विकसित की जाती हैं।
      • इन योजनाओं में भौतिक, सामाजिक और आर्थिक कारकों सहित विभिन्न कारकों पर विचार किया जाता है ताकि उनका व्यवस्थित विकास सुनिश्चित किया जा सके।
      • इसका उद्देश्य पर्याप्त बुनियादी ढाँचे और सेवाओं के साथ व्यक्तियों के स्थायी तथा वास योग्य वातावरण विकसित करना है।
    • अनियोजित बसाव: अनियोजित बस्तियाँ बिना किसी विधिक अनुमोदन के, सरकारी भूमि अथवा निजी संपत्ति पर अव्यवस्थित तरीके से विकसित होती हैं।
      • इन क्षेत्रों में स्थायी, अर्द्ध-स्थायी और अस्थायी बस्तियाँ शामिल हैं, जो अमूमन शहर के नालों, रेलवे पटरियों, बाढ़ के प्रति सुभेद्य निम्न इलाकों अथवा शहरों के समीप स्थित कृषि भूमि तथा हरित पट्टी पर पाई जाती हैं।
  • शहरीकरण के रुझान:
    • एशियाई विकास बैंक की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में शहरी क्षेत्रों की जनसंख्या वर्ष 1950 में 751 मिलियन (विश्व की कुल जनसंख्या का 30%) थी वर्ष 2018 में बढ़कर 4.2 बिलियन (विश्व की कुल जनसंख्या का 55%) हो गई।
      • ये अनुमान दर्शाते हैं कि यह आँकड़ा वर्ष 2030 तक 5.2 बिलियन (विश्व की कुल जनसंख्या का 60%) और वर्ष 2050 तक 6.7 बिलियन (विश्व की कुल जनसंख्या का 68%) हो जाएगा।
    • भारत की शहरी जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हुई है। 2011 की जनगणना के अनुसार, वर्ष 2001 में शहरीकरण 27.7% था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 31.1% हो गया, जिनकी संख्या कुल 377.1 मिलियन है और इसकी वार्षिक वृद्धि दर 2.76% है।
    • शहरीकरण की यह प्रवृत्ति बड़े टियर 1 शहरों (1,00,000 और उससे अधिक जनसख्या) से हटकर मध्यम आकार के शहरों की ओर स्थानांतरित हो गई है, जिसका कारण रोज़गार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे विभिन्न पुश तथा पुल फैक्टर हैं।
    • आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में वास कर रहे व्यक्तियों की कुल संख्या के संदर्भ में, महाराष्ट्र में इसकी संख्या सर्वाधिक है जो कि 50.8 मिलियन व्यक्ति है। यह देश की कुल जनसंख्या का 13.5% है।
      • उत्तर प्रदेश में यह संख्या लगभग 44.4 मिलियन है, जिसके बाद तमिलनाडु का स्थान है जहाँ यह संख्या  34.9 मिलियन है।
  • शहरीकरण के कारण:
    • व्यापार और उद्योग: व्यापार और उद्योग से श्रम आकर्षित होने एवं बुनियादी ढाँचे के विकास को प्रोत्साहन मिलने के साथ बाज़ारों तथा नवाचार केंद्रों के विस्तार के कारण शहरीकरण को बढ़ावा मिलता है।
    • आर्थिक अवसर: ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में रोज़गार के अवसर अधिक होते हैं क्योंकि यहाँ व्यवसायों, कारखानों एवं अन्य संस्थानों की सघनता अधिक होती है।
    • शिक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में स्कूल और विश्वविद्यालय बेहतर होते हैं। इससे शिक्षा और नौकरी की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिये लोग आकर्षित होते हैं।
    • बेहतर जीवनशैली: शहरों में अस्पताल एवं पुस्तकालय जैसी बेहतर सेवाओं के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवसर होने से जीवनशैली बेहतर होती है।
    • प्रवासन: भारत के शहरीकरण में प्रवासन का प्रमुख योगदान रहा है जिसके कारण अनौपचारिक बस्तियों का विकास होता है। शहरी क्षेत्रों की औपचारिक बस्तियों में रहने की उच्च लागत के कारण प्रवासी अक्सर अनियोजित बस्तियों में बस जाते हैं।
      • इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अनौपचारिक बस्तियाँ (जैसे कि झुग्गी-झोपड़ियाँ और अनधिकृत कॉलोनियाँ) विकसित होती हैं जिसके कारण स्वच्छ जल एवं स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है।

भारत में शहरी शासन से संबंधित ढाँचा:

  • संस्थाएँ:
    • आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA): यह राष्ट्रीय नीतियाँ तैयार करने के साथ शहरी विकास से संबंधित केंद्र सरकार की योजनाओं की देखरेख करता है।
    • शहरी विकास से संबंधित राज्य के विभाग: ये केंद्र सरकार की नीतियों को लागू करने और राज्य-विशिष्ट शहरी विकास विनियमनों के विकास में भूमिका निभाते हैं।
    • नगर निगम/नगरपालिकाएँ: ये अपने क्षेत्राधिकार में स्थानीय स्तर के योजना-निर्माण, नियंत्रण तथा सेवा वितरण के लिये ज़िम्मेदार हैं।
    • शहरी विकास प्राधिकरण (UDAs): ये विशिष्ट शहरी क्षेत्रों या परियोजनाओं के विकास के लिये स्थापित विशेष एजेंसियाँ हैं।
  • संवैधानिक और विधिक ढाँचा:
    • भारतीय संविधान (अनुच्छेद 243Q, 243W): यह स्थानीय सरकारों (नगर निकायों) को उनके क्षेत्राधिकार में शहरी नियोजन और विकास के लिये सशक्त बनाता है।
    • 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992: इसके माध्यम से शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया और संविधान में भाग IX-A को शामिल किया गया।
    • 12वीं अनुसूची: इसमें नगरपालिकाओं की शक्तियों, अधिकारों एवं ज़िम्मेदारियों का उल्लेख है।
  • प्रमुख सरकारी पहलें:
    • स्मार्ट सिटीज़
    • अमृत मिशन 
    • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी
    • प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी
    • आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम
    • दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM)
  • शहरी विकास के संबंध में भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताएँ:
    • SDG लक्ष्य 11 के तहत सतत् विकास को प्राप्त करने के लिये अनुशंसित तरीकों में से एक के रूप में शहरी नियोजन को बढ़ावा देना है।
    • यूएन-हैबिटेट के न्यू अर्बन एजेंडा को वर्ष 2016 में हैबिटेट III में अपनाया गया था।
      • यह शहरी क्षेत्रों की योजना, निर्माण, विकास, प्रबंधन और सुधार के सिद्धांतों को सामने रखता है।
    • यूएन-हैबिटेट (वर्ष 2020) द्वारा सुझाव दिया गया है कि किसी शहर की भौगोलिक स्थितियों से इसके सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय मूल्यों को महत्त्व मिल सकता है।
    • UNFCCC लक्ष्य: भारत द्वारा नवंबर, 2021 में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (COP 26) के 26वें सत्र में वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य प्राप्त करने की घोषणा की।
    • आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) और भारत सरकार के बीच मुख्यालय समझौते (HQA) को भारत द्वारा अनुमोदित किया गया है।

शहरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

  • पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ:
    • वायु प्रदूषण एवं पर्यावरण क्षरण: भारत के शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर हैं, जिसका मुख्य कारण वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधियाँ एवं निर्माण परियोजनाएँ हैं।
      • उदाहरण: विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट, 2023 के अनुसार, शीर्ष 10 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 9 भारत में हैं।
    • शहरी बाढ़ एवं जल निकासी अवसंरचना: अपर्याप्त वर्षा जल निकासी प्रणालियाँ एवं प्राकृतिक जल निकायों पर अतिक्रमण के कारण मानसून के दौरान शहरी क्षेत्रों में प्राय: बाढ़ आती है।
      • भारत ने हाल के वर्षों में बाढ़ में हो रही पुनरावृत्ति का अनुभव किया है, विशेष रूप से हैदराबाद (वर्ष 2020 एवं वर्ष 2021), चेन्नई (नवंबर 2021), बंगलूरू तथा अहमदाबाद (वर्ष 2022), दिल्ली के कुछ हिस्सों (जुलाई 2023) तथा नागपुर (सितंबर 2023) में, जिससे कई निवासियों को अपना घर खाली करने के लिये मजबूर होना पड़ा।
    • शहरी ताप द्वीप प्रभाव तथा हरित स्थानों की कमी: तीव्र शहरीकरण एवं हरित स्थानों की कमी के कारण नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव उत्पन्न हुआ है, जिससे तापमान एवं ऊर्जा की मांग में वृद्धि हुई है।
      • उदाहरण: दिल्ली में हीटवेब ने मई 2024 में शहर की बिजली की मांग को 8,000 मेगावाट से अधिक की रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँचा दिया है।
    • जल की कमी एवं अपर्याप्त जल प्रबंधन: विभिन्न शहरों को तीव्रता से हो रहे शहरीकरण के साथ जनसंख्या वृद्धि और घटते भूजल स्तर के कारण गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ रहा है।
      • उदाहरण: चेन्नई में वर्ष 2019 में गंभीर जल संकट था, जिसके कारण निवासियों को जल के टैंकरों एवं अलवणीकरण संयंत्रों पर निर्भर रहना पड़ा। इसके अतिरिक्त  बंगलूरू में हाल ही में जल संकट इस मुद्दे की गहराई को उजागर करता है।
  • अपर्याप्त आवास एवं अनौपचारिक बस्तियों का प्रसार: आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2012 से वर्ष 2027 के बीच भारत में शहरी आवास की कमी लगभग 18.78 मिलियन इकाई थी, जिसमें 65 मिलियन से अधिक लोग झुग्गी-झोपड़ियों या अनौपचारिक बस्तियों में रह रहे थे।
    • इसके परिणामस्वरूप बुनियादी ढाँचे पर दबाव पड़ता है, गरीबी बढ़ती है, नियोजित विकास में बाधा उत्पन्न होती है, एवं साथ ही शहरी क्षेत्रों में समग्र रहने योग्य और सामाजिक सामंजस्यता भी कम होती है।
  • यातायात संबंधी चुनौतियाँ: तीव्र शहरीकरण एवं निजी वाहनों में वृद्धि के कारण यातायात संबंधी चुनौतियाँ बढ़ गई है, यात्रा का समय बढ़ गया है और साथ ही उत्पादकता में भी बाधा उत्पन्न हुई है।
    • उदाहरण: बंगलूरू में, यातायात की औसत गति लगभग 18 किमी/घंटा होने का अनुमान है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में कमी तथा साथ ही ईंधन की बर्बादी के कारण महत्त्वपूर्ण आर्थिक हानि होती है।
  • अपर्याप्त ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: भारतीय शहर ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन के लिये संघर्ष करते हैं, जिसके कारण कूड़े का ढेर लग जाता है और स्वास्थ्य संबंधी खतरे उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारतीय शहरों में प्रतिवर्ष लगभग 62 मिलियन टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसमें से केवल 20% का ही उचित तरीके से प्रसंस्करण/उपचार किया जाता है।
  • साइबर सुरक्षा एवं लचीले डिजिटल बुनियादी ढाँचा: प्रमुख शहरी स्थानों में बढ़ते डिजिटलीकरण के साथ-साथ डिजिटल खतरे भी बढ़ रहे हैं और साथ ही लचीले डिजिटल बुनियादी ढाँचे का निर्माण एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है।
    • वर्ष 2022 में एम्स दिल्ली पर रैनसमवेयर हमला शहरी डिजिटल प्रणालियों की भेद्यता को उजागर करता है।

शहरी चुनौतियों से निपटने के लिये क्या कदम उठाने की आवश्यकता है?

  • पर्यावरण संबंधी पहल:
    • स्पंज सिटी अवधारणा एवं पारगम्य शहरी परिदृश्य: “स्पंज सिटी” अवधारणा को क्रियान्वित करना, जिसमें शहरी परिदृश्य में पारगम्य फुटपाथ, हरित छत, वर्षा जल उद्यान तथा अन्य जल-अवशोषित सुविधाओं का एकीकरण शामिल है।
    • वितरित अपशिष्ट से ऊर्जा तथा विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियाँ: समुदाय आधारित अपशिष्ट प्रबंधन पहल को प्रोत्साहित करना तथा अपशिष्ट संग्रहण, छँटाई एवं प्रसंस्करण के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना।
    • स्मार्ट जल प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण अवसंरचना: लीकेज का पता लगाने, जल वितरण को अनुकूलित करने एवं कुशल जल उपयोग को बढ़ावा देने के लिये स्मार्ट जल मीटरिंग के साथ निगरानी प्रणालियों की तैनाती करना।
  • शहरी डिजिटल जुड़वाँ और पूर्वानुमान मॉडलिंग: शहरी क्षेत्रों के डिजिटल ट्विन्स विकसित करना, जो शहरों की आभासी प्रतिकृतियाँ हैं, ताकि विभिन्न परिदृश्यों, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं और पर्यावरणीय प्रभावों का अनुकरण तथा विश्लेषण किया जा सके।
    • डेटा-संचालित निर्णय-प्रक्रिया, नागरिक सहभागिता और सहभागितापूर्ण शहरी नियोजन प्रक्रियाओं को सक्षम करने के लिये शहरी शासन प्लेटफॉर्मों के साथ डिजिटल ट्विन्स को एकीकृत करना।
  • स्मार्ट सिटी अवसंरचना: स्मार्ट सिटी प्रौद्योगिकियों का लोकतंत्रीकरण, जैसे कि बुद्धिमान यातायात प्रबंधन प्रणालियाँ, स्मार्ट ग्रिड और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)-सक्षम सार्वजनिक सेवाओं को सुरक्षित करना, ताकि कार्यकुशलता में सुधार हो, कार्बन उत्सर्जन में कमी आए तथा नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि हो।
  • साइबर सुरक्षा और डिजिटल अवसंरचना लचीलापन: महत्त्वपूर्ण शहरी डिजिटल अवसंरचना को साइबर खतरों से बचाने के लिये उन्नत एन्क्रिप्शन, अभिगम नियंत्रण और वास्तविक समय खतरे की निगरानी सहित मज़बूत साइबर सुरक्षा उपायों में निवेश करना।
  • अभिगम्यता एवं जागरूकता: विभिन्न पहलों के माध्यम से शहरीकरण को संबोधित करने के सरकारी प्रयासों को अक्सर पहुँच के मामले में महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिये सूचना का बेहतर प्रसार और सहभागी शासन समावेशिता का एक साधन हो सकता है।

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