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भारत में वृद्ध होती जनसंख्या

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वृद्धावस्था या आयु वृद्धि (ageing) की परिघटना इस सदी के सबसे महत्त्वपूर्ण अनुभवों में से एक है, जो ऐतिहासिक रूप से कम प्रजनन स्तर के साथ-साथ मानव दीर्घायुता में उल्लेखनीय प्रगति से चिह्नित होती है।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 104 मिलियन वृद्धजन (60+ वर्ष) मौजूद हैं, जो कुल जनसंख्या का 8.6% हैं। वृद्धजनों (60+) में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक देश में 193 मिलियन वृद्धजन होंगे, जो कुल जनसंख्या के लगभग 13% होंगे। UNFPA रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश में वृद्ध जनसंख्या का प्रतिशत वर्ष 2050 तक दोगुना होकर कुल जनसंख्या के 20% से अधिक होने का अनुमान है।

यद्यपि वृद्धजनों की बढ़ती संख्या चिंताजनक प्रतीत हो सकती है, लेकिन वृद्ध होती जनसंख्या को समर्थन देने हेतु प्रभावी नीतियाँ एवं कार्यक्रम विकसित करने के लिये दीर्घायुता और उभरती भेद्यताओं से संबद्ध चुनौतियों को समझना आवश्यक है।

वृद्धजन होने की पात्रता

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) 60-74 वर्ष की आयु वाले लोगों को वृद्धजन मानता है। वर्ष 1980 में संयुक्त राष्ट्र ने जनसंख्या के वृद्धजन वर्ग के लिये संक्रमण की आयु 60 वर्ष निर्धारित की थी, जिसे निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:
    • युवा वृद्ध (Young Old): 60-75 वर्ष की आयु के बीच।
    • वृद्ध-वृद्ध (Old-Old): 75-85 वर्ष की आयु के बीच।
    • अत्यंत वृद्ध (Very Old): 85 वर्ष और उससे अधिक
  • विश्व जनसंख्या डेटा शीट-2002 में 65+ आयु वर्ग की जनसंख्या को वृद्ध जनसंख्या माना गया है।
  • भारतीय संदर्भ में, किसी व्यक्ति को वृद्ध के रूप में वर्गीकृत करने के उद्देश्य से भारत की जनगणना द्वारा 60 वर्ष की आयु को अपनाया गया है, जो सरकारी क्षेत्र में सेवानिवृत्ति की आयु के साथ भी संगत है।

 

भारत में वृद्धावस्था की परिघटना में योगदान देने वाले प्राथमिक कारक कौन-से हैं?

  • दीर्घयुता में वृद्धि:
    • भारत में दीर्घायुता (Longevity) में वृद्धि का एक मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार है। पिछले कुछ दशकों में चिकित्सा प्रौद्योगिकी, उपचार और निवारक देखभाल में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है।
      • WHO के अनुसार भारत में जीवन प्रत्याशा वर्ष 2000 में 62.1 वर्ष से 5.2 वर्ष बढ़कर वर्ष 2021 में 67.3 वर्ष हो गई।
  • बेहतर जीवन दशाएँ:
    • स्वच्छ जल, स्वच्छता और बेहतर पोषण तक पहुँच सहित बेहतर जीवन दशाओं ने भी सुदीर्घ आयु में योगदान दिया है।
      • ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से स्वच्छता कवरेज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे जलजनित रोगों की व्यापकता में कमी आई है।
  • प्रजनन दर में कमी :
    • भारत ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से विभिन्न परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू किये हैं, जो प्रजनन दर को कम करने में सफल रहे हैं।
      • वर्ष 2019-21 के दौरान आयोजित NFHS के पाँचवें दौर के अनुसार, कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 2.0 बच्चे प्रति महिला हो गई है, जो प्रजनन क्षमता के प्रतिस्थापन स्तर (प्रति महिला 2.1 बच्चे) से कम है।
  • सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन:
    • सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, जैसे कि महिला शिक्षा एवं कार्यबल में उनकी भागीदारी में वृद्धि, ने भी प्रजनन दर को कम करने में भूमिका निभाई है।
    • महिलाओं में उच्च शिक्षा का स्तर देरी से विवाह और कम बच्चों को जन्म देने से जुड़ा हुआ है। शहरीकरण के कारण छोटे परिवार के मानदंड विकसित हुए हैं, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में बच्चों का पालन-पोषण अधिक महँगा और मांगपूर्ण सिद्ध हो सकता है।
      • उच्च साक्षरता दर और उन्नत स्वास्थ्य सेवा के लिये प्रशंसित केरल राज्य भारत में सबसे अधिक जीवन प्रत्याशा और सबसे कम प्रजनन दर प्रदर्शित करने वाले राज्यों में से एक है। वृद्ध आबादी के प्रबंधन में केरल अन्य राज्यों के लिये एक मॉडल के रूप में कार्य करता है।

वृद्धजन आबादी से संबंधित कानूनी प्रावधान 

  • अनुच्छेद 41 और अनुच्छेद 46 वृद्धजनों के लिये संवैधानिक प्रावधान प्रदान करते हैं। हालाँकि, नीति निर्देशक तत्व (directive principles) कानून के तहत प्रवर्तनीय नहीं होते, लेकिन यह किसी भी कानून के निर्माण के समय राज्य को एक सकारात्मक दायित्व सौंपते हैं।
  • हिंदू विवाह एवं दत्तक ग्रहण अधिनियम, 1956 की धारा 20 में वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण को बाध्यकारी प्रावधान बनाया गया है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अंतर्गत वृद्ध माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं।
  • ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007’ बच्चों या उत्तराधिकारियों के लिये अपने माता-पिता या परिवार के वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने का उद्देश्य रखता है।

भारत में वृद्धजन आबादी से संबद्ध विभिन्न चुनौतियाँ

  • दैनिक जीवन संबंधी गतिविधियों में बाधा:
    • लगभग 20% वृद्धजन दैनिक जीवन संबंधी गतिविधियों (Activities of Daily Living- ADL)—जिसमें नहाने-धोने, कपड़े बदलने, भोजन करने और चलने-फिरने जैसी बुनियादी स्व-देखभाल गतिविधियाँ शामिल हैं, में बाधाओं का अनुभव करते हैं।
    • अकेले रहने वाले या पर्याप्त पारिवारिक सहयोग के बिना रहने वाले वृद्धजन प्रायः ADL बाधाओं से जूझते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी स्वतंत्रता क्षीण होती हैं और देखभाल सेवाओं की आवश्यकता बढ़ जाती है।
  • बहु-रुग्णता (Multi-Morbidity):
    • वृद्धजनों में अनेक दीर्घकालिक बीमारियों का एक साथ होना एक आम समस्या है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता बढ़ जाती है।
    • LASI (Longitudinal Ageing Survey of India) की रिपोर्ट के अनुसार 75% वृद्ध आबादी एक या एक से अधिक दीर्घकालिक बीमारियों (जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गठिया एवं हृदय संबंधी रोग) से पीड़ित है।
  • गरीबी:
    • आर्थिक असुरक्षा वृद्धजनों के लिये एक महत्त्वपूर्ण चिंता का विषय है, विशेष रूप से उन लोगों के लिये जिनके पास आय के स्थिर स्रोत नहीं हैं, जो उनके जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवा के उपयोग को प्रभावित करते हैं।
    • इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत में 40% से अधिक वृद्धजन निर्धनतम वर्ग वर्ग में शामिल हैं, जिनमें से लगभग 18.7% के पास आय का कोई साधन नहीं है।
  • बदलती स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताएँ:
    • एक ऐसी जनसांख्यिकी, जहाँ वृद्धजनों की वृद्धि दर युवाओं की वृद्धि दर से कहीं अधिक है, वृद्धजनों को गुणवत्तापूर्ण, वहनीय और सुलभ स्वास्थ्य एवं देखभाल सेवाएँ उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती है।
    • उन्हें घर पर विशेष चिकित्सा सेवाओं की आवश्यकता होती है, जिनमें टेली या होम कंसल्टेशन, फिजियोथेरेपी एवं पुनर्वास सेवाएँ, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श एवं उपचार और फार्मास्यूटिकल एवं डायग्नोस्टिक सेवाएँ शामिल हैं।
  • सामाजिक मुद्दे:
    • पारिवारिक उपेक्षा, शिक्षा का निम्न स्तर, सामाजिक-सांस्कृतिक धारणाएँ एवं कलंक, संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं पर कम भरोसा जैसे कारक वृद्धजनों की स्थिति को और बदतर कर देते हैं।
    • सुविधाओं तक पहुँच में असमानता वृद्धजनों की समस्याओं को और बढ़ा देती है, जो पहले से ही शारीरिक, आर्थिक और कई बार मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसी सुविधाओं को समझने तथा उनका लाभ उठाने में सीमित पहुँच रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप, उनमें से अधिकांश उपेक्षा का जीवन जीने को विवश होते हैं।
  • अंतर्निहित रूप से लैंगिक आधार:
    • जनसंख्या की आयु वृद्धि के उभरते मुद्दों में से एक ‘आयु वृद्धि का नारीकरण’ (Feminization of Ageing) भी है, जो इंगित करता है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक संख्या में वृद्ध आबादी में शामिल हो रही हैं।
      • भारत की जनगणना से पता चलता है कि वर्ष 1951 में वृद्धजनों का लिंग अनुपात उच्च रहा था (1028) था, जो वर्ष 1971 तक घटकर लगभग 938 रह गया, लेकिन वर्ष 2011 तक पुनः बढ़कर 1033 हो गया।
    • वृद्धावस्था में गरीबी अंतर्निहित रूप से लैंगिक आधार रखती है जहाँ वृद्ध महिलाओं के विधवा होने, अकेले रहने, बिना आय के जीवनयापन करने एवं कम निजी संपत्ति रखने और सहायता के लिये पूरी तरह से परिवार पर निर्भर रहने की संभावना अधिक होती है।
  • अपर्याप्त कल्याणकारी योजनाएँ:
    • नीति आयोग की एक रिपोर्ट से प्रकट होता है कि ‘आयुष्मान भारत’ और विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के बावजूद 400 मिलियन भारतीयों के पास स्वास्थ्य व्यय के लिये कोई वित्तीय कवर नहीं है।
    • केंद्र और राज्य स्तर पर पेंशन योजनाएँ मौजूद होने के बावजूद, कुछ राज्यों में मात्र 350 से 400 रुपए प्रति माह की मामूली राशि प्रदान की जाती है और वह भी सार्वभौमिक रूप से प्रदान नहीं की जाती है।

वृद्ध जनसंख्या के कल्याण के लिये विभिन्न पहलें

  • वैश्विक स्तर पर की गई पहलें:
    • वियना अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना
    • वृद्धजनों के लिये संयुक्त राष्ट्र सिद्धांत
    • 2021-2030 ‘स्वस्थ आयु वृद्धि दशक’ के रूप में निर्दिष्ट
    • सतत विकास के लिये 2030 एजेंडा में किसी को भी पीछे न छोड़ने तथा यह सुनिश्चित करने का आह्वान किया गया है कि सभी आयु वर्गों के लिये सतत विकास लक्ष्य (SDGs) पूरे किये जाएँ, जहाँ वृद्धजनों सहित सबसे कमज़ोर/भेद्य लोगों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
  • भारत सरकार द्वारा की गई पहलें:
    • SACRED पोर्टल
    • सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन (SAGE)
    • एल्डर लाइन (Elder Line)
    • वृद्धजनों के लिये एकीकृत कार्यक्रम (IPOP)
    • राष्ट्रीय वयोश्री योजना (RVY)
    • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS)
    • प्रधानमंत्री वय वंदना योजना
    • वयोश्रेष्ठ सम्मान
    • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण (MWPSC) अधिनियम, 2007

भारत में वृद्ध आबादी के सशक्तीकरण के लिये कौन-से कदम उठाए जाने चाहिये?

  • अभाव से सुरक्षा:
    • वृद्धजनों के लिये सम्मानजनक जीवन की दिशा में पहला कदम यह होगा कि उन्हें अभाव और इससे उत्पन्न सभी वंचनाओं से बचाया जाए। पेंशन के रूप में प्रदत्त नकद राशि विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने और अकेलेपन से बचने में मदद कर सकती है। यही कारण है कि वृद्धावस्था पेंशन दुनिया भर में सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
      • सामाजिक सुरक्षा पेंशन में सुधार लाना एक अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्हें स्वास्थ्य देखभाल, दिव्यांगता सहायता, दैनिक कार्यों में सहायता, मनोरंजन के अवसर और एक बेहतर सामाजिक जीवन जैसे अन्य सहयोग एवं सुविधाओं की भी आवश्यकता है।
  • अग्रणी राज्यों का अनुकरण करना:
    • दक्षिणी राज्यों और ओडिशा एवं राजस्थान जैसे गरीब राज्यों ने सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन की स्थिति प्राप्त कर ली है। उनके कार्य अनुकरणीय हैं। यदि केंद्र सरकार राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) में सुधार करे तो सभी राज्यों के लिये ऐसा करना बहुत आसान हो जाएगा।
  • वृद्ध महिलाओं की चिंताओं को चिह्नित करना:
    • नीति में इस तथ्य का भी संज्ञान लिया जाना चाहिये कि भारत में महिलाएँ औसतन पुरुषों की तुलना में तीन वर्ष अधिक जीती हैं। अनुमान है कि वर्ष 2026 तक वृद्धजनों का लिंग अनुपात बढ़कर 1060 हो जाएगा। चूँकि भारत में महिलाएँ आमतौर पर अपने पतियों से कम आयु की होती हैं, इसलिये वे प्रायः वृद्धावस्था में विधवा के रूप में जीवन बिताती हैं।
      • इसलिये, नीति में विशेष रूप से अधिक असुरक्षित और आश्रित वृद्ध एकल महिलाओं का ध्यान रखा जाना चाहिये ताकि वे सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन जी सकें।
  • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित करना:
    • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW), सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (MSJE) और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) को इस मामले में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। इनके बीच बेहतर सहकार्यता से आवश्यक सुधारों की दिशा में कार्य शुरू हो सकता है।
      • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण (संशोधन) विधेयक, 2019, यह विधेयक वृद्धजनों के लिये गृह-आधारित देखभाल को विनियमित करने का उद्देश्य रखता है। यह घर पर देखभाल सेवाएँ प्रदान करने वाली संस्थाओं के पंजीकरण और उनके लिये न्यूनतम मानक निर्धारित करने का प्रस्ताव करता है। हालाँकि वर्ष 2019 में संसद में पेश किये जाने के बाद से इसे पारित नहीं किया गया है।
  • वृद्धजन समावेशी समाज का निर्माण करना:
    • वृद्धाश्रमों (Old-Age-Homes- OAHs) में सभी वृद्धजनों के लिये उचित स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित करने के प्रभावी तरीकों में से एक यह सुनिश्चित करना है कि इन आश्रमों में वृद्धों की संख्या कम या सीमित हो। वृद्धजन समाज के लिये एक संपत्ति हैं, न कि कोई बोझ और इस संपत्ति का लाभ उठाने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि उन्हें वृद्धाश्रमों में अलग-थलग करने के बजाय मुख्यधारा की आबादी में शामिल किया जाए।
  • वृद्धजनों के प्रति धारणा में बदलाव लाना:
    • वृद्धजनों को बोझ समझने की धारणा को नवोन्मेषी संस्थाओं और सामाजिक एजेंसियों द्वारा बदला जा सकता है, जो उन्हें सशक्त बनाती हैं और उन्हें उत्पादक सामाजिक भूमिकाओं में एकीकृत करती हैं।
    • समाज वृद्धजनों के अनुभव, कौशल और ज्ञान का लाभ उठाते हुए उनकी सक्रिय भागीदारी से लाभान्वित हो सकता है।
      • ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ द थर्ड एज’ (U3A) एक अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन है जो सेवानिवृत्त और अर्द्ध-सेवानिवृत व्यक्तियों को आजीवन अधिगम के अवसर प्रदान करता है। यह प्रौद्योगिकी से लेकर कला तक, विभिन्न विषयों में निरंतर शिक्षा को प्रोत्साहित करता है।
      • सिंगापुर की ‘वरिष्ठजन रोज़गार योजना’ (Senior Employment Scheme) नौकरी चाहने वाले वृद्धजनों को ऐसे नियोक्ताओं से मिलाने में मदद करती है जो उनके अनुभव और विश्वसनीयता को महत्त्व देते हैं।

निष्कर्ष

वृद्धजनों के बारे में लोगों की धारणा को बदलने और उन्हें दायित्व के बजाय संपत्ति के रूप में देखने में नवोन्मेषी संस्थाएँ और सामाजिक एजेंसियाँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नीतिगत पहलों को शिक्षा, रोज़गार, स्वयंसेवा, स्वास्थ्य एवं कल्याण और सामाजिक समावेशन के अवसर प्रदान करने के माध्यम से वृद्धजनों को सशक्त बनाना चाहिये तथा उन्हें उत्पादक सामाजिक भूमिकाओं में एकीकृत करना चाहिये।

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