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भारत में राजकोषीय संघवाद

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केरल राज्य द्वारा संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र सरकार के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में दायर किये गए मुक़दमे में न्यायालय से केंद्र सरकार को राज्य द्वारा उधार ली जा सकने वाली धनराशि की अधिकतम सीमा को हटाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया, जिसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293 की व्याख्या की आवश्यकता उत्पन्न की है। यह अनुच्छेद राज्यों द्वारा धन उधार लेने की शक्ति और ऐसे उधार को विनियमित करने के संघ के अधिकार को नियंत्रित करता है। जबकि केरल राज्य ने उधार ले सकने में अधिक स्वायत्तता का तर्क दिया है, केंद्र सरकार ऋण विनियमन के माध्यम से व्यापक आर्थिक स्थिरता की आवश्यकता पर बल देती है।

चूँकि यह पहला अवसर है जब अनुच्छेद 293 की व्याख्या की आवश्यकता पड़ी है, मामले को अनुच्छेद 145 के तहत संविधान पीठ को सौंप दिया गया है जहाँ पाँच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा इसका निर्णय किया जाना है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आगामी निर्णय का भारत में राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ना तय है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293 के उपबंध और सीमाएँ 

  • उपबंध:
    • राज्य द्वारा उधार लेने की शक्ति: राज्य अपनी संचित निधि की प्रतिभूति पर, राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर उधार ले सकते हैं।
      • केंद्र सरकार संसद द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर राज्य ऋणों के लिये प्रत्याभूति/गारंटी दे सकती है।
    • सहमति की आवश्यकता: यदि किसी राज्य पर संघ का कोई बकाया ऋण है या संघ द्वारा गारंटीकृत ऋण है, तो उसे कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार की सहमति लेनी होगी।
      • संघ ऐसी सहमति पर शर्तें अधिरोपित कर सकता है।
      • भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ अस्थायी ओवरड्राफ्ट या अन्य ऐसी व्यवस्था के लिये सहमति की आवश्यकता नहीं है।
    • पिछले ऋणों की निरंतरता: किसी राज्य द्वारा लिये गए ऋण, जो संविधान के प्रारंभ होने पर बकाया थे, उन्हीं नियमों और शर्तों के अधीन लागू रहेंगे।
  • सीमाएँ:
    • अनुच्छेद 293 के तहत राज्यों के उधार को विनियमित करने का अधिकार राज्यों द्वारा केंद्र सरकार से लिये गए ऋण से संबद्ध है।
      • यदि राज्य अपने संघीय ऋणों का भुगतान कर देते हैं तो इससे एक संभावित संवैधानिक अंतराल पैदा हो सकता है, क्योंकि इस अनुच्छेद में बकाया ऋणों के बिना राज्य द्वारा लिये जाने वाले उधार को विनियमित करने के लिये कोई उपबंध नहीं है।
      • इससे आर्थिक रूप से सुदृढ़ राज्य संघीय ऋणों का भुगतान करने और फिर संघीय निगरानी के बिना उधार लेने में सक्षम हो सकते हैं।
    • इसके अलावा, राज्यों द्वारा अनुच्छेद 293 की सीमाओं से बचने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs ) का अधिकाधिक उपयोग किया जा रहा है।
      • उदाहरण के लिये, नवीन मामले में केरल ने तर्क दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को प्राप्त ऋणों को राज्य के ऋण की गणना में नहीं गिना जाना चाहिये।
      • चूँकि राज्य अन्य स्रोतों से उधार ले रहे हैं, इसलिये संभावना है कि कुछ राज्यों पर जल्द ही केंद्र का कोई बकाया नहीं रह जाएगा, जिससे अनुच्छेद 293 अप्रासंगिक हो जाएगा।
        • इस प्रवृत्ति की पहचान सबसे पहले 14वें वित्त आयोग ने की थी।
      • यह खामी (loophole) राज्यों को उधार लेने की सीमा को पार कर सकने की अनुमति देती है, राज्य की वास्तविक ऋणग्रस्तता को अस्पष्ट करती है और राजकोषीय पारदर्शिता एवं जवाबदेही को जटिल बनाती है, जिससे प्रच्छन्न वित्तीय जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • संविधान पीठ के समक्ष विचार के लिये मुख्य प्रश्न:
    • राज्य का उधार लेने का अधिकार: क्या राज्य को अनुच्छेद 293 के तहत उधार लेने का ‘अधिकार’ है और क्या संघ इस अधिकार को विनियमित कर सकता है?
    • PSUs के ऋण: क्या राज्य सरकार के PSUs द्वारा लिया गया ऋण अनुच्छेद 293 के दायरे में आता है?

राज्य द्वारा संघ से उधार लेने के नवीनतम रुझान क्या हैं?

  • RBI के हाल के आँकड़े दिखाते हैं की राज्य ऋणों में केंद्र की हिस्सेदारी में व्यापक कमी आई है, जो वर्ष 1991 में 57% से घटकर वित्त वर्ष 2020 में मात्र 3% रह गई।
    • यह बदलाव राज्यों की बाज़ार उधारी और वित्त के अन्य स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
    • इसके अलावा, राज्यों को दिए जाने वाले संघ के ऋणों में यह कमी प्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद 293 की प्रयोज्यता को प्रभावित करती है, क्योंकि इसकी नियामक शक्ति संघ से ऋण प्राप्त करने वाले राज्यों से जुड़ी हुई है।
  • कोविड-19 महामारी ने संघ से राज्य के उधार में गिरावट की प्रवृत्ति को अस्थायी रूप से उलट दिया, जहाँ आर्थिक दबाव और राजस्व की कमी के कारण वित्त वर्ष 2020 में यह 3% से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 8.6% हो गया।
    • हालाँकि इसे अल्पकालिक प्रवृत्ति माना जा रहा है और अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ राज्य फिर से महामारी से पहले के उधार पैटर्न पर लौट सकते हैं जहाँ उनकी उधारी में केंद्र से प्राप्त ऋण की मामूली हिस्सेदारी होगी।

राज्य के निर्बाध उधार लेने के अधिकार के पक्ष और विपक्ष में तर्क 

  • पक्ष में तर्क:
    • राजकोषीय स्वायत्तता: उधारी राज्यों को स्वतंत्र रूप से अपने वित्त का प्रबंधन करने में सक्षम बनाती है, जो संघवाद के सिद्धांतों के अनुरूप है।
      • यह राज्यों को विकास परियोजनाओं के लिये धन जुटाने तथा संघीय अनुदान पर पूर्ण निर्भर हुए बिना स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाता है, जिससे आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ावा मिलता है।
      • यह राज्यों को अपने क्षेत्र की विशिष्ट आर्थिक चुनौतियों या अवसरों पर त्वरित प्रतिक्रिया देने के लिये लचीलापन भी प्रदान करता है, जिससे समग्र शासन प्रभावकारिता में वृद्धि होती है।
    • आर्थिक विकास: राज्य द्वारा लिया गया उधार वृहत अवसंरचना परियोजनाओं के वित्तपोषण को सुगम बनाता है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है।
      • राजस्व की अस्थायी कमी को पूरा करने के रूप में इन उधारियों से आवश्यक सेवाओं और विकास कार्यक्रमों में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिलती है।
      • इसके अलावा, यह राज्यों को निजी निवेश आकर्षित करने और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के निर्माण लिये अपनी उधार लेने की क्षमता का लाभ उठाने में सक्षम बनाता है, जिससे आर्थिक प्रगति में तेज़ी आ सकती है।
      • उदाहरण: महाराष्ट्र की 46,000 करोड़ रुपए की मुंबई-नागपुर एक्सप्रेस-वे परियोजना, जो बड़े पैमाने पर उधार के माध्यम से वित्तपोषित है, यह दर्शाती है कि राज्य किस प्रकार वृहत अवसंरचना को वित्तपोषित करने के लिये उधार का उपयोग कर सकते हैं, जो आर्थिक विकास एवं कनेक्टिविटी को बढ़ावा देता है।
    • वित्तीय प्रबंधन में लचीलापन: उधार लेने से राज्यों को आर्थिक आघातों और राजस्व में उतार-चढ़ाव के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है, जिससे उनकी वित्तीय प्रत्यास्थता बढ़ती है।
      • यह लचीलापन करों में वृद्धि करने का एक विकल्प भी प्रदान करता है, जो विशेष रूप से आर्थिक तनाव की अवधि के दौरान राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण या आर्थिक रूप से अवांछनीय सिद्ध हो सकता है।
    • स्थानीय निर्वाचक के प्रति जवाबदेही: उधार लेने की शक्ति राज्य सरकारों को अपने निर्वाचक के प्रति अधिक प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह बनाती है, क्योंकि उन्हें अपने उधार लेने के निर्णयों को उचित ठहराना होता है तथा धन के प्रभावी उपयोग को प्रदर्शित करना होता है।
      • मतदाता उधार ली गई धनराशि के उपयोग के आधार पर सरकार के प्रदर्शन का आकलन कर सकते हैं, जिससे उन्हें अधिक सूचित चुनावी विकल्प चुनने में मदद मिल सकती है।
      • यह समीकरण अधिक संलग्न और वित्तीय रूप से जागरूक नागरिकों के उभार में योगदान दे सकता है, जिससे राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक शासन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
    • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद (Competitive Federalism): उधार लेने की क्षमता राज्यों को निवेश एवं व्यवसाय आकर्षित करने में प्रतिस्पर्द्धा कर सकने की अनुमति देती है, जिससे संभावित रूप से नवोन्मेषी विकास रणनीतियों को बढ़ावा मिलता है।
      • इस तरह के प्रतिस्पर्द्धी संघवाद से राज्यों में सर्वोत्तम अभ्यासों की पहचान और प्रसार की स्थिति बन सकती है, जिससे समग्र राष्ट्रीय विकास में योगदान मिलेगा।
  • विपक्ष में तर्क:
    • राजकोषीय अनुशासनहीनता का जोखिम: उधार लेने की अप्रतिबंधित शक्ति के कारण राज्य अधारणीय स्तर तक ऋण एकत्रित कर सकते हैं, जिससे उनका दीर्घकालिक राजकोषीय स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है।
      • अल्पकालिक चुनावी लाभ जैसे राजनीतिक पहलू उधार लेने के निर्णय में आर्थिक विवेक की उपेक्षा कर सकते हैं, जिससे संसाधनों के गलत आवंटन की स्थिति बन सकती है।
      • अत्यधिक राज्य ऋण का ‘स्पिलओवर’ प्रभाव उत्पन्न हो सकता है, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है तथा अन्य राज्य भी प्रभावित हो सकते हैं।
      • उदाहरण: पंजाब का उच्च ऋण-जीएसडीपी अनुपात (debt-to-GSDP ratio), जो वर्ष 2021-22 में 53.3% तक पहुँच गया, आंशिक रूप से लोकलुभावन योजनाओं के लिये उधार लेने के कारण है।
    • वृहद आर्थिक स्थिरता संबंधी चिंताएँ: असमन्वित और अत्यधिक राज्य उधारी राष्ट्रीय मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों में हस्तक्षेप कर सकती है, जिससे संघ स्तर पर आर्थिक प्रबंधन जटिल बन सकता है।
      • इसके अलावा, इससे देश की समग्र क्रेडिट रेटिंग और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में उधार लेने की लागत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे पूरे देश की वित्तीय स्थिति प्रभावित होगी।
      • उदाहरण: वर्ष 2020-21 में जब राज्यों के सकल बाज़ार उधारी में 55% की वृद्धि हुई तो इससे राज्य विकास ऋणों पर अधिक लाभ हुआ, जिससे संभावित रूप से समग्र ब्याज दरें और केंद्र सरकार की उधारी लागत प्रभावित हुई।
    • अंतर-राज्यीय असमानताएँ: राज्यों के अलग-अलग आर्थिक सामर्थ्य उनकी उधार लेने की क्षमता में महत्त्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकते हैं, जिससे मौजूदा क्षेत्रीय असमानताएँ और भी बढ़ सकती हैं।
      • आर्थिक रूप से सुदृढ़ राज्यों को अधिक अनुकूल शर्तों पर ऋण प्राप्त हो सकता है, जबकि गरीब राज्यों को अधिक उधार लागत का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।
      • परिणामस्वरूप, संतुलित क्षेत्रीय विकास को बनाए रखने के लिये संघीय हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे संघीय संबंध संभवतः जटिल बन सकते हैं।
    • ऋण प्रबंधन में जटिलता: कई राज्यों द्वारा स्वतंत्र रूप से उधार लेने से राष्ट्रीय स्तर पर समग्र सार्वजनिक ऋण प्रबंधन व्यापक रूप से जटिल बन सकता है।
      • विविध राज्य उधारों की निगरानी और विनियमन प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकता है, जिसके लिये परिष्कृत निरीक्षण तंत्र की आवश्यकता होगी।
      • राज्यों और संघ के बीच ऋण दायित्वों के ‘ओवरलैपिंग’ या परस्पर विरोधी होने का भी जोखिम है, जिससे कानूनी और वित्तीय जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं।
      • उदाहरण: वर्ष 2015 में उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (UDAY) की शुरूआत, जिसके तहत राज्यों ने बिजली वितरण कंपनियों के ऋणों को अपने ऊपर ले लिया, से समग्र ऋण प्रबंधन जटिल हो गया तथा राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के उधारों के बीच की रेखाएँ धुंधली हो गईं।
    • डिफॉल्ट और बेलआउट की संभावना: गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे राज्य अपने ऋणों का भुगतान करने में डिफॉल्ट कर सकते हैं, जिसका ऋणदाताओं और व्यापक वित्तीय प्रणाली के लिये दूरगामी परिणाम उत्पन्न हो सकता है।
      • प्रायः यह अंतर्निहित अपेक्षा रहती है कि केंद्र सरकार ऋण चूक की स्थिति में राज्यों को सहायता प्रदान करेगी, जिससे एक नैतिक संकट पैदा होता है जो फिर गैर-उत्तरदायी उधारी को बढ़ावा दे सकता है।
      • राज्य द्वारा ऋण न चुकाने या राहत पैकेज की संभावना से भी भारतीय बाज़ार में निवेशकों का भरोसा घट सकता है, जिससे समग्र आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

उप-राष्ट्रीय ऋणों (Subnational Debts) के प्रबंधन की अन्य संघीय प्रणालियाँ कौन-सी हैं?

  • ब्राज़ील: ब्राज़ील का राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून सरकार के सभी स्तरों पर सख्त उधार सीमाएँ अधिरोपित करता है, जिससे राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित होता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: राज्यों को उधार लेने में उच्च स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन वे बाज़ार अनुशासन के अधीन हैं और स्वतंत्रता को वित्तीय जवाबदेही के साथ संतुलित करते हैं।
  • जर्मनी: संघीय और राज्य सरकारों के बीच साझा राजकोषीय ज़िम्मेदारी रखने वाला सहकारी संघवाद मॉडल समन्वित एवं संतुलित वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित करता है।

इन अंतर्राष्ट्रीय उदाहरणों का अध्ययन करने से भारत को अपने संघीय ढाँचे के भीतर राज्य ऋणों के प्रबंधन के लिये अधिक सुदृढ़ एवं अनुकूलनीय प्रणाली के निर्माण में मदद मिल सकती है।

राज्यों के राजकोषीय स्वास्थ्य में सुधार के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • प्रोत्साहन-आधारित राजकोषीय उत्तरदायित्व ढाँचा: यह दृष्टिकोण व्यापक राजकोषीय प्रदर्शन मापन के आधार पर उधार सीमा की एक स्तरीकृत प्रणाली को लागू कर सकेगा।
    • यह ढाँचा ऋण-जीएसडीपी अनुपात जैसे पारंपरिक संकेतकों तक सीमित नहीं होगा और इसमें राजस्व सृजन दक्षता, विकास परिणाम एवं राजकोषीय पारदर्शिता जैसे उपायों को शामिल किया जाएगा।
    • उदाहरण के लिये, यदि कोई राज्य अपने कर राजस्व में पिछले वर्ष की तुलना में 10% की वृद्धि करता है तो उसे जीएसडीपी का अतिरिक्त 0.5% उधार लेने की अनुमति दी जा सकती है।
    • यह प्रणाली एक सकारात्मक फीडबैक लूप तैयार करेगी जो राज्यों को अपने राजकोषीय प्रबंधन में निरंतर सुधार के लिये प्रोत्साहित करेगी।
  • प्रौद्योगिकी-संचालित राजकोषीय निगरानी प्रणाली: सभी राज्यों के लिये रियल-टाइम, AI-संचालित राजकोषीय निगरानी प्रणाली विकसित करने से राजकोषीय प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
    • यह प्रणाली राजस्व, व्यय और उधार पैटर्न पर नज़र रखेगी तथा राजकोषीय तनाव की पूर्व चेतावनी देगी।
    • ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी के क्रियान्वयन से राजकोषीय आँकड़ों की पारदर्शिता एवं अपरिवर्तनीयता सुनिश्चित होगी, हेरफेर को रोका जा सकेगा और विश्वास का निर्माण होगा।
  • राजकोषीय बीमा पूल: राज्य अपने राजकोषीय स्वास्थ्य के आधार पर सामूहिक बीमा कोष में योगदान कर सकते हैं। यह कोष आर्थिक आघातों के दौरान अस्थायी राहत प्रदान करेगा, जिससे अत्यधिक उधार लेने की आवश्यकता कम हो जाएगी।
    • यह प्रणाली राजकोषीय विवेकशीलता को प्रोत्साहित करेगी, क्योंकि योगदान और भुगतान राज्य के दीर्घकालिक राजकोषीय प्रदर्शन से जुड़े होंगे।
  • ‘क्रॉस-स्टेट फिस्कल मेंटरशिप प्रोग्राम’ (Cross-State Fiscal Mentorship Programs): वित्तीय रूप से सुदृढ़ राज्यों को मेंटरशिप प्रोग्राम में कमज़ोर राज्यों के साथ संबद्ध किया जाए। मेंटर राज्य वित्तीय प्रबंधन पर विशेषज्ञता एवं मार्गदर्शन प्रदान करेगा, जबकि बदले में स्वयं पुरस्कार के रूप में अतिरिक्त उधार अधिकार अर्जित कर सकता है।
    • यह पीयर-टू-पीयर लर्निंग अंतर-राज्यीय सहयोग को बढ़ावा दे सकता है और सर्वोत्तम अभ्यासों का नैसर्गिक रूप से प्रसार कर सकता है।
  • स्वतंत्र राजकोषीय परिषदें: राज्य स्तर पर स्वतंत्र राजकोषीय परिषदों की स्थापना की जाए।
    • ये गैर-पक्षपातपूर्ण निकाय राज्य बजट का विश्लेषण कर सकते हैं, राजकोषीय स्वास्थ्य का वस्तुनिष्ठ आकलन कर सकते हैं और संवहनीय ऋण प्रबंधन अभ्यासों के लिये अनुशंसाएँ दे सकते हैं।

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