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भारत में गिग वर्क का भविष्य

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भारत की तेज़ी से विकास करती गिग इकॉनमी (Gig Economy)—जो ज़ोमैटो और स्विगी जैसे स्टार्टअप्स के उदय से संचालित है, ने कई लोगों के लिये जीवन को अधिक सुविधाजनक बना दिया है। स्मार्टफोन ऐप पर बस कुछ टैपिंग के साथ आवश्यक वस्तुएँ और सेवाएँ सीधे हमारे दरवाज़े तक पहुँच जाती हैं। हालाँकि यह सुविधा ‘डिलीवरी पार्टनर्स’ की एक बड़ी संख्या द्वारा वहन की जाने वाली एक महत्त्वपूर्ण मानवीय लागत पर प्राप्त होती है जो इस गिग कार्यबल की रीढ़ हैं। ये श्रमिक या कर्मी, जो प्रायः प्रति माह 11,000 रुपए या उससे भी कम कमाते हैं, कठोर कामकाजी दशाओं का सामना करते हैं, बुनियादी अधिकारों एवं सुरक्षा का अभाव रखते हैं और नियमित रोज़गार की गरिमा से वंचित होते हैं।

भारत की तेज़ी से विकास करती गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म इकॉनमी पर नीति आयोग (NITI Aayog) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2029-30 तक गिग कार्यबल में 23.5 मिलियन श्रमिक शामिल होंगे। अपने ‘नवाचार’ के लिये प्रसिद्ध गिग इकॉनमी मॉडल श्रमिकों को कर्मचारी (employees) के बजाय ‘भागीदार’ (partners) के रूप में वर्गीकृत कर श्रम लागत को कम करता है। इन श्रमिकों की क्रय शक्ति और उनके द्वारा प्रदत्त सेवा का लाभ उठाने वाले समृद्ध उपभोक्ताओं के बीच व्यापक अंतराल आर्थिक एवं सामाजिक दोनों रूप से इस मॉडल की दीर्घकालिक संवहनीयता के बारे में महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है।

गिग इकॉनमी (Gig Economy) क्या है?

  • परिचय: गिग इकॉनमी एक श्रम बाज़ार है, जो अल्पकालिक, स्वतंत्र (फ्रीलांस) या अनुबंध-आधारित कार्य व्यवस्था द्वारा चिह्नित होती है, जिसे प्रायः ऐसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों के माध्यम से सुगम बनाया जाता है जो श्रमिकों को उपभोक्ताओं या व्यवसायों से संबद्ध करते हैं।
    • यह पारंपरिक एवं स्थायी रोज़गार से हटकर अधिक लचीले, कार्य-आधारित और मांग-आधारित कार्यबल की ओर संक्रमण को परिलक्षित करती है।
  • संरचना:
    • श्रमिक (Workers): स्वतंत्र ठेकेदार, फ्रीलांसर या अस्थायी श्रमिक जो निर्धारित शुल्क या प्रति घंटा दर पर विशिष्ट कार्य या परियोजनाएँ पूरी करते हैं।
    • व्यवसाय/ग्राहक: ऐसी कंपनियाँ या व्यक्ति जो पूर्णकालिक पद सृजित करने के बजाय विशिष्ट परियोजनाओं या कार्यों के लिये गिग श्रमिकों (gig workers) को नियुक्त करते हैं।
    • प्लेटफ़ॉर्म: प्रायः ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म व्यवसायों/ग्राहकों को गिग श्रमिकों से जोड़ने वाले मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं।
      • ये प्लेटफ़ॉर्म कार्य वितरण, भुगतान प्रसंस्करण और संचार का प्रबंधन कर सकते हैं। (उदाहरण के लिये: अपवर्क, उबर, स्विगी)

 

भारत में गिग श्रमिकों से संबंधित विधायी ढाँचा 

  • विधायी ढाँचा:
    • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: यह अधिनियम गिग श्रमिकों को एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता देता है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करने की परिकल्पना करता है।
      • हालाँकि, विशिष्ट नियमों और कार्यान्वयन विवरण को अभी भी अलग-अलग राज्यों द्वारा अंतिम रूप दिया जाना शेष है।
    • वेतन संहिता, 2019: यह संहिता गिग कार्य सहित सभी क्षेत्रों पर लागू होती है और एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन के लिये आधार प्रदान करती है। हालाँकि, वास्तविक न्यूनतम वेतन राज्य और कौशल स्तर के आधार पर भिन्न-भिन्न होता है।
  • नीति और योजना
    • भारत की गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म इकॉनमी पर नीति आयोग की रिपोर्ट (2022): यह रिपोर्ट गिग श्रमिकों के लिये प्लेटफ़ॉर्म आधारित कौशल विकास पहल और सामाजिक सुरक्षा उपायों को बढ़ावा देने की अनुशंसा करती है। यह डेटा संग्रह और गिग कार्यबल की बेहतर गणना की आवश्यकता पर भी बल देती है।

भारत में गिग इकॉनमी के विकास को प्रेरित करने वाले कारक कौन-से हैं?

  • स्मार्टफोन और मोबाइल की बढ़ती पैठ: स्मार्टफोन की बढ़ती पैठ और इंटरनेट तक सस्ती पहुँच (जहाँ भारत में दुनिया में प्रति स्मार्टफोन उपयोगकर्ता सबसे अधिक मोबाइल डेटा का उपभोग किया जाता है) ने व्यवसायों के लिये श्रमिकों से सीधे जुड़ने के लिये एक मंच तैयार किया है।
  • बदलती कार्य प्राथमिकताएँ: आबादी का ‘मिलेनियल्स’ और ‘जेन जेड’ तबका कार्य-जीवन संतुलन और लचीलेपन को अधिक प्राथमिकता देता है। गिग इकॉनमी उन्हें अपनी परियोजनाएँ चुनने, अपना शेड्यूल तय करने और कहीं से भी कार्य कर सकने की आज़ादी प्रदान करती है।
    • उदाहरण के लिये, दिल्ली की कोई ग्राफिक डिज़ाइनर ‘अपवर्क’ पर फ्रीलांस प्रोजेक्ट करते हुए फोटोग्राफी के अपने शौक को पूरा कर सकती है। यह लचीलापन पारंपरिक 9 से 5 वाली नौकरी में संभव नहीं होता।
  • स्टार्टअप संस्कृति का उदय और ई-कॉमर्स विकास: भारत ने स्टार्टअप और वित्तपोषण में उछाल का अनुभव किया है, जहाँ वर्ष 2020 में 16,000 से अधिक नई टेक कंपनियाँ शामिल हुईं।
    • भारत में फलता-फूलता स्टार्टअप पारितंत्र कंटेंट सृजन, वेब डेवलपमेंट और मार्केटिंग जैसे विभिन्न कार्यों के लिये अनुबंधित श्रमिकों पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
    • उभरती ई-कॉमर्स कंपनियों को भी लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी के लिये बड़े एवं लचीले कार्यबल की आवश्यकता होती है।
  • सुविधा की उपभोक्ता मांग: भारतीय उपभोक्ताओं (विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में) की ओर से फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स जैसी सुविधाजनक एवं त्वरित सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है।
    • इस मांग ने गिग वर्कर्स के लिये एक बाज़ार सृजित किया है जहाँ वे डिलीवरी एक्जीक्यूटिव, कैब ड्राइवर जैसी भूमिकाओं को स्वीकार कर सकते हैं।
  • निम्न-लागत श्रम की प्रचुरता: वर्तमान में लगभग 47% गिग कार्य मध्यम-कुशल नौकरियों में, जबकि लगभग 31% गिग कार्य निम्न-कुशल नौकरियों में पाए जाते हैं।
    • भारत में अर्द्ध-कुशल एवं अकुशल श्रमिकों की एक विशाल संख्या पाई जाती है जो औपचारिक रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण गिग कार्य करने को तैयार होते हैं।
    • श्रम की यह अति आपूर्ति गिग प्लेटफ़ॉर्मों को कम वेतन एवं बदतर कार्य दशाओं की पेशकश करने की अनुमति देती है और एक तरह से प्लेटफ़ॉर्म के विकास को बढ़ावा देती है।

 

भारत में गिग श्रमिकों के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियाँ कौन-सी हैं?

  • बुनियादी अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा का अभाव: गिग श्रमिकों को आमतौर पर कर्मचारियों के बजाय स्वतंत्र ठेकेदारों या ‘भागीदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसके साथ ही, भारत में गिग कार्य से संबंधित कोई विनियमन मौजूद नहीं है।
    • इससे वे उन बुनियादी अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा लाभों से वंचित हो जाते हैं जिनके नियमित कर्मचारी हक़दार होते हैं, जैसे न्यूनतम वेतन, सवेतन अवकाश, स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन।
    • उदाहरण के लिये, ज़ोमैटो और स्विगी जैसी कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर्स को कठोर कार्य दशाओं का सामना करने के बावजूद कोई लाभ या जोखिम भत्ता प्राप्त नहीं होता है।
  • अनिश्चित रोज़गार और आय असुरक्षा: गिग कार्य स्वाभाविक रूप से अनिश्चित प्रकृति का होता है और इसमें रोज़गार सुरक्षा का अभाव होता है।
    • श्रमिकों को आसानी से प्लेटफ़ॉर्म से अलग किया जा सकता है, जिससे उनकी आय और आजीविका का नुकसान हो सकता है।
    • इसके अलावा, उनकी कमाई प्रायः अप्रत्याशित होती है और इसमें मांग के आधार पर उतार-चढ़ाव होती रहती है, जिससे वित्तीय योजना बनाना कठिन हो जाता है।
  • शोषण और अनुचित व्यवहार: कानूनी संरक्षण का अभाव तथा श्रमिकों और प्लेटफ़ॉर्मों के बीच शक्ति असंतुलन शोषण के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।
    • श्रमिकों को अनुचित मांगों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे कि उनसे यह ‘शपथ’ लेना कि जब तक वे लक्ष्य पूरा नहीं कर लेते, तब तक वे पानी नहीं पीएँगे या शौचालय का उपयोग नहीं करेंगे।
  • स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिम: गिग कार्य में प्रायः शारीरिक रूप से कठिन कार्य शामिल होते हैं, जैसे डिलीवरी या राइड-शेयरिंग, जिससे श्रमिकों को स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिम का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण के लिये, वर्तमान परिदृश्य में देखा जा सकता है कि उत्तर भारत में हीट वेव के कहर के दौरान भी डिलीवरी पार्टनर्स बिना किसी जोखिम भत्ते के या संबद्ध कंपनियों की ओर से किसी सहायता के कार्य कर रहे हैं।
    • इसके अतिरिक्त, 10 मिनट में डिलीवरी करने जैसी नीति के अनुपालन से इन डिलीवरी श्रमिकों के जीवन के लिये खतरा उत्पन्न होता है।
      • बीमा कवरेज के अभाव में दुर्घटना या चोट लगने की स्थिति में वित्तीय बोझ बढ़ जाता है।
  • सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का अभाव: गिग श्रमिक आमतौर पर अलग-थलग ढंग से कार्य करते हैं और उनमें बेहतर कार्य दशाओं एवं पारिश्रमिक के लिये यूनियन का निर्माण करने या सामूहिक सौदेबाजी करने की क्षमता का अभाव होता है।
    • इस शक्ति असंतुलन के कारण उनके लिये अपने अधिकारों की पैरोकारी करना या जिन प्लेटफॉर्म के लिये वे कार्य करते हैं, उनके साथ बेहतर शर्तों पर सौदेबाजी करना कठिन हो जाता है।

भारत में गिग श्रमिकों से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • विनियामक सुधार और कानूनी मान्यता: व्यापक विनियामक सुधारों की आवश्यकता है जो गिग श्रमिकों की रोज़गार स्थिति को कानूनी मान्यता और स्पष्ट परिभाषा प्रदान करे।
    • इसमें मौजूदा श्रम संहिताओं में संशोधन करना या विशेष रूप से गिग श्रमिकों के लिये नया कानून लाना शामिल हो सकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वे न्यूनतम मज़दूरी और अन्य श्रम सुरक्षाओं के हक़दार हैं।
  • त्रिपक्षीय शासन संरचना की स्थापना करना: सरकार, गिग प्लेटफ़ॉर्म और श्रमिक प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक त्रिपक्षीय शासन संरचना स्थापित की जा सकती है।
    • इससे प्रभावी संवाद, सामूहिक सौदेबाजी और उचित कार्य दशाओं, शिकायत निवारण तंत्र एवं श्रमिक कल्याण उपायों के लिये उद्योग-व्यापी मानकों तथा दिशानिर्देशों का निर्माण संभव हो सकेगा।
  • कौशल विकास और कौशल उन्नयन संबंधी पहलें: भारत को वर्तमान बाज़ार परिदृश्यों के अनुरूप गिग श्रमिकों को कौशल विकास एवं कौशल उन्नयन के अवसर प्रदान करने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि उन्हें उच्च-भुगतान वाली भूमिकाओं की ओर संक्रमण करने या उद्यमशील उपक्रमों को आगे बढ़ाने में सक्षम बनाया जा सके।
    • इसमें व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों और सरकार समर्थित कार्यक्रमों के साथ सहकार्यता स्थापित करना शामिल हो सकता है।
  • सामाजिक सुरक्षा समावेशन: गिग श्रमिकों को स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा और पेंशन योजना प्रदान करने के लिये सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधानों को लागू किया जाए।
    • इसे प्लेटफ़ॉर्म योगदान, सरकारी सब्सिडी और श्रमिक कटौतियों के संयोजन के माध्यम से वित्तपोषित किया जा सकता है।
  • उचित वेतन और एल्गोरिदम संबंधी पारदर्शिता: उचित वेतन संरचना और पारदर्शी एल्गोरिदम (जिसके आधार पर वेतन दरों और कार्य आवंटन का निर्धारण होता है) सुनिश्चित करने के लिये संबद्ध प्लेटफॉर्म को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिये। गिग श्रमिकों के पास अनुचित एल्गोरिदमिक निर्णयों को चुनौती देने का अधिकार होना चाहिये।
  • ‘गिग वर्कर डेटा पोर्टेबिलिटी’: डेटा पोर्टेबिलिटी मानकों को लागू किया जाए जो गिग श्रमिकों को अपने कार्य इतिहास, रेटिंग और कौशल प्रमाणपत्रों को विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर स्थानांतरित करने की अनुमति देगा। इससे प्लेटफ़ॉर्म विशेष पर निर्भरता कम हो जाएगी और श्रमिकों की गतिशीलता में सुधार होगा।
    • डेटा सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी चिंताओं का समाधान किया जाना भी आवश्यक है ताकि सुनिश्चित हो कि स्थानांतरण के दौरान डेटा सुरक्षित रहे।
  • ग्रीष्म संरक्षण नीतियाँ: श्रम विभागों के दिशा-निर्देशों के अनुरूप, चरम हीट वेव के दौरान डिलीवरी कर्मचारियों के लिये शीतलन सहायक उपकरण, अनिवार्य अवकाश और प्रतिपूरक वेतन प्रदान करने हेतु प्लेटफॉर्मों के लिये आवश्यक विशिष्ट नीतियाँ प्रदान की जाएँ।
    • हीट वेव को देखते हुए ज़ोमैटो ने हाल ही में अपने ग्राहकों से आग्रह किया है कि वे दोपहर के समय भोजन का ऑर्डर देने से बचें (जब तक कि यह ‘नितांत आवश्यक’ न हो, जो इस दिशा में एक प्रशंसनीय कदम है।

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