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भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र

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पूर्वी हिमालय में बसा भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र मनमोहक भूदृश्यों, विविध संस्कृतियों और समृद्ध आदिवासी विरासत की भूमि है। हालाँकि, इस क्षेत्र को अपने स्वदेशी समुदायों को मुख्यधारा के विकास आख्यान में पूरी तरह से एकीकृत करने में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों और जीवंत सांस्कृतिक अस्मिता से संपन्न होने के बावजूद, पूर्वोत्तर भारत कमज़ोर अवसंरचना, बाज़ारों तक सीमित पहुँच, सामाजिक असमानताओं और मणिपुर जैसे हालिया संघर्ष जैसे मुद्दों से जूझ रहा है। इस जटिलता के एक उदाहरण के रूप में असम के कार्बी आंगलोंग में अदरक की खेती के मामले को देखा जा सकता है, जहाँ एक सहकारी समिति का उद्देश्य स्वदेशी अदरक उत्पादकों को सशक्त बनाना था, लेकिन पारंपरिक संस्थाओं के कमज़ोर पड़ने और शोषक बिचौलियों के प्रभुत्व जैसे कारकों के कारण अंततः यह विफल हो गया।

यह मामला इस बात को उज़ागर करता है कि भारत को अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा देश के शेष भागों के बीच की खाई को दूर करने के लिये और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। भारत अपने पूर्वोत्तर भूभाग में निवेश कर सांस्कृतिक समृद्धि, आर्थिक अवसर और पर्यावरण संरक्षण के खजाने का द्वार खोल सकता है।
भारत के लिये पूर्वोत्तर क्षेत्र का क्या महत्त्व है?

रणनीतिक भू-राजनीतिक अवस्थिति: पूर्वोत्तर को भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाले एक प्रमुख आर्थिक गलियारे के रूप में देखा जाता है।
भारत-म्याँमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट जैसी अवसंरचना परियोजनाएँ केवल क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के मुकाबले भारत को एक आर्थिक प्रतिपक्ष के रूप में स्थापित करने का भी लक्ष्य रखती हैं।
इसकी अनूठी भौगोलिक अवस्थिति इसे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के लिये महत्त्वपूर्ण बनाती है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करना है।
समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधन: पूर्वोत्तर भारत विश्व के जैव विविधता संपन्न ‘हॉटस्पॉट’ में से एक है, जहाँ वनस्पतियों और जीवों की अनेक दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से लेकर अल्पाइन घास के मैदानों तक इसके विविध पारिस्थितिकी तंत्र, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस क्षेत्र में तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले के महत्त्वपूर्ण भंडार भी मौजूद हैं, जो इसे भारत की विकास करती अर्थव्यवस्था के लिये प्राकृतिक संसाधनों का एक मूल्यवान स्रोत बनाते हैं।
सांस्कृतिक विविधता और जातीय विविधता: पूर्वोत्तर क्षेत्र 220 से अधिक जातीय समूहों और इतनी ही बोलियों के साथ भारत की सांस्कृतिक विविधता का सूक्ष्म रूप में प्रतिनिधित्व करता है।
संस्कृतियों, परंपराओं और भाषाओं की यह समृद्धि वैश्विक मंच पर भारत की बहुलवादी पहचान और ‘सॉफ्ट पॉवर’ में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।
इस क्षेत्र की अनूठी सांस्कृतिक विरासत—जिसमें संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प और पाक-कला परंपराएँ शामिल हैं, सांस्कृतिक पर्यटन के लिये अपार संभावनाएँ प्रदान करती हैं।
कृषि और बागवानी की संभावनाएँ: पूर्वोत्तर भारत की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ इसे विभिन्न उच्च मूल्यवान और विदेशी किस्मों सहित कई प्रकार की फसलों की खेती के लिये उपयुक्त बनाती हैं।
इस क्षेत्र में जैविक खेती, पुष्प-कृषि (floriculture) और औषधीय पौधों की खेती की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं, जो जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग के अनुरूप है।
जल विद्युत उत्पादन: प्रचुर जल संसाधनों और पहाड़ी इलाकों के कारण पूर्वोत्तर क्षेत्र जलविद्युत उत्पादन की भी अपार क्षमता रखता है।
अनुमान है कि इस क्षेत्र में लगभग 58,000 मेगावाट जल विद्युत क्षमता है, जो भारत की कुल क्षमता का लगभग 40% है।
इस क्षमता का दोहन न केवल क्षेत्र की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा कर सकेगा, बल्कि भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेगा।
पर्यटन क्षमता: पूर्वोत्तर भारत के अछूते भूदृश्य, विविध वन्य जीवन, अनूठी सांस्कृतिक विरासत और ‘एडवेंचर टूरिज़्म’ के अवसर पर्यटन उद्योग के लिये महत्त्वपूर्ण अप्रयुक्त क्षमता प्रस्तुत करते हैं।
काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के गैंडा निवास वाले घास के मैदानों से लेकर मेघालय और केबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान के सजीव रूट ब्रिज (living root bridges) तक, यह क्षेत्र ऐसे अनूठे अनुभव प्रदान करता है जो घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है।
मानव संसाधन विकास: पूर्वोत्तर भारत में साक्षरता दर 78.5% है जो राष्ट्रीय औसत (74%) से उच्च है और यहाँ की युवा आबादी एक जनसांख्यिकीय लाभांश प्रस्तुत करती है, जो भविष्य में भारत के विकास को गति प्रदान कर सकती है।
इस भूभाग में शिक्षा, कौशल विकास और रोज़गार सृजन में निवेश से इस क्षमता का दोहन किया जा सकता है, जिससे पूर्वोत्तर क्षेत्र नवाचार एवं उद्यमिता का केंद्र बन सकता है।

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ:

उग्रवाद और जातीय संघर्ष: कई समूहों के साथ शांति समझौते के बावजूद उग्रवाद की चुनौती बनी हुई है, विशेष रूप से मणिपुर और नगालैंड के कुछ हिस्सों में जहाँ वे स्वायत्तता की मांग रखते हैं।
मणिपुर में मैतेई और कुकी जातीय समूहों के बीच हाल ही में उभरी हिंसा (वर्ष 2023) अंतर-जातीय संबंधों की संवेदनशीलता को उजागर करती है।
ये संघर्ष न केवल सुरक्षा के लिये खतरा पैदा करते हैं, बल्कि विकास संबंधी प्रयासों और विदेशी निवेश में भी बाधा डालते हैं, जिससे फिर अविकास और अशांति का एक ऐसा दुष्चक्र निर्मित होता है जिसे तोड़ना कठिन हो जाता है।
कृषि संबंधी चुनौतियाँ: पूर्वोत्तर भारत के कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के बावजूद इसे कृषि संबंधी महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ।
सिक्किम ने जैविक खेती को बढ़ावा दिया, लेकिन इसकी सफलता सीमित रही। जैविक उत्पादों के लिये प्रीमियम मूल्यों की कमी, प्रमाणीकरण में कठिनाई और सस्ते एवं प्रायः आयातित उर्वरकों से प्रतिस्पर्द्धा के कारण किसान जैविक खेती को अपनाने में संकोच रखते हैं।
इसके अलावा, बिचौलियों का प्रभुत्व पूर्वोत्तर क्षेत्र में कृषि के लिये एक निरंतर बाधा बना हुआ है। यहाँ तक कि सहकारी समितियों (जैसे अदरक उत्पादक सहकारी संघ) जैसी पहलें भी प्रतिस्पर्द्धा के मामले में संघर्षरत रही हैं।
ये बिचौलिये प्रायः किसानों को आवश्यक ऋण और आपूर्ति पहले ही उपलब्ध करा देते हैं, जिससे ऋण और निर्भरता के एक दुष्चक्र का निर्माण हो जाता है।
बाज़ार पर यह नियंत्रण बिचौलियों को कीमतें तय करने की अनुमति देता है, जिससे किसानों को उनके कठोर श्रम के बावजूद न्यूनतम लाभ प्राप्त होता है।
चीन का बढ़ता प्रभाव और सीमा विवाद: अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा और सीमा पर उसका अवसंरचना विकास गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है।
तवांग (दिसंबर 2022) और डोकलाम क्षेत्र में हाल की झड़पें दोनों देशों के बीच के तनाव को रेखांकित करती हैं।
म्याँमार में चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव से पूर्वोत्तर क्षेत्र के अलग-थलग पड़ने का खतरा भी पैदा हो गया है, जिससे इस क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों को चुनौती मिल रही है।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण: पूर्वोत्तर क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है, जिसमें अनियमित वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन शामिल हैं।
वर्ष 2022 में असम में आई बाढ़ इस भेद्यता का एक उदाहरण है जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए।
अवसंरचना की कमी और कनेक्टिविटी संबंधी समस्याएँ: ‘एक्ट ईस्ट’ नीति जैसे हाल के प्रयासों के बावजूद, यह क्षेत्र अभी भी अवसंरचना के मामले में पिछड़ा हुआ है।
भारत-म्याँमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख परियोजनाओं की धीमी प्रगति दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक एकीकरण में बाधा उत्पन्न कर रही है।
क्षेत्र में लास्ट-मील कनेक्टिविटी की स्थिति बदतर बनी हुई है, जिससे विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आर्थिक अवसर प्रभावित हो रहे हैं।
आर्थिक अविकास और बेरोज़गारी: इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है और क्षेत्र का सीमित औद्योगिकीकरण ही हुआ है।
पूर्वोत्तर औद्योगिक विकास योजना (2017) जैसी हालिया पहलों को निवेश आकर्षित करने में सीमित सफलता प्राप्त हुई है।
युवाओं में उच्च बेरोज़गारी सामाजिक अशांति और पलायन को बढ़ावा देती है, जिससे प्रतिभा पलायन या ‘ब्रेन ड्रेन’ की स्थिति बनती है जो विकास को और अधिक बाधित करती है।
मादक पदार्थों की तस्करी और सीमा पार अपराध: ‘गोल्डन ट्राइंगल’ से पूर्वोत्तर क्षेत्र की निकटता ने इसे मादक पदार्थों की तस्करी के प्रति संवेदनशील बना दिया है।
हाल के वर्षों में मादक पदार्थों की जब्ती में, विशेष रूप से मणिपुर और मिज़ोरम में, वृद्धि देखी गई है।
इससे न केवल कानून प्रवर्तन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं, बल्कि युवाओं में नशे की लत जैसे सामाजिक संकट भी उत्पन्न होते हैं, जिससे क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

राजनीतिक अस्थिरता और शासन संबंधी मुद्दे: सरकार में बार-बार होने वाले परिवर्तन, विशेषकर मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में, नीतिगत निरंतरता में बाधा डालते हैं।
जातीय राजनीति, स्वायत्तता की मांग और राष्ट्रीय राजनीतिक गतिशीलता की जटिल अंतर्क्रिया के परिणामस्वरूप प्रायः अस्थिर गठबंधनों का निर्माण होता है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पर हाल के विवादों ने राजनीतिक परिदृश्य को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे विरोध प्रदर्शन और अंतर-सामुदायिक तनाव बढ़ गया है।

भारत पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकरण को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकता है?

‘उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम’ सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम: भारत के उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी राज्यों के बीच वृहतस्तरीय एवं दीर्घकालिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम शुरू किया जाए।
इसमें वर्षावधिक छात्र आदान-प्रदान, आर्टिस्ट रेसीडेंसी और बिजनेस इनक्युबेशन कार्यक्रम शामिल हो सकते हैं।
इसका लक्ष्य भौगोलिक दृष्टि से दूर अवस्थित इन क्षेत्रों के बीच गहन, व्यक्तिगत संबंध का सृजन करना और ज़मीनी स्तर पर समझ एवं एकीकरण को बढ़ावा देना होगा।
‘डिजिटल सिल्क रोड’ पहल: पूर्वोत्तर भारत के लिये विशेष रूप से एक अत्याधुनिक डिजिटल अवसंरचना नेटवर्क विकसित किया जाए, ताकि इसे भारत के डिजिटल नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
इसमें टेक कंपनियों के लिये कर प्रोत्साहन, विशिष्ट डिजिटल कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम और पर्वतीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिये उपयुक्त प्रौद्योगिकियों के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए ‘सिलिकॉन वैली ऑफ द ईस्ट’ की स्थापना करना शामिल हो सकता है।
इससे न केवल पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में एकीकृत होगा, बल्कि म्याँमार, वियतनाम आदि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी स्थानांतरित करने के माध्यम से इसे अग्रणी क्षेत्र भी बना देगा।
अंतर्राष्ट्रीय स्वदेशी ज्ञान विश्वविद्यालय: स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए पूर्वोत्तर भारत में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, जिसमें भारत के अन्य भागों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से विद्वानों एवं छात्रों को आमंत्रित किया जाए।
यह संस्थान स्वदेशी संस्कृतियों, पारंपरिक चिकित्सा, सतत् कृषि और पारिस्थितिक संरक्षण के अध्ययन एवं संरक्षण के लिये एक वैश्विक केंद्र बन सकता है, जो पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक सांस्कृतिक एवं बौद्धिक सेतु के रूप में स्थापित कर सकता है।
पूर्वोत्तर ओलंपिक प्रशिक्षण केंद्र: खेलों के प्रति पूर्वोत्तर क्षेत्र के जूनून का लाभ उठाते हुए यहाँ एक अत्याधुनिक ओलंपिक प्रशिक्षण केंद्र का निर्माण किया जाए।
यह विभिन्न ओलंपिक खेलों में खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिये भारत का प्राथमिक प्रतिष्ठान बन सकता है, जिससे इस क्षेत्र की ओर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित होगा और खेलों के माध्यम से गौरव एवं एकीकरण की भावना को बढ़ावा मिलेगा।
फ्लोटिंग मार्केट टूरिज्म सर्किट: दक्षिण-पूर्व एशियाई मॉडल से प्रेरणा लेते हुए अनूठी भारतीय विशेषता के साथ पूर्वोत्तर भारत की नदियों में तैरते बाज़ार या फ्लोटिंग मार्केट का एक नेटवर्क विकसित किया जाए।
यह एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण बन सकता है, जो क्षेत्र की विविधता को प्रदर्शित करेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा और भारत के पर्यटन परिदृश्य में एक विशिष्ट पूर्वोत्तर ब्रांड का निर्माण करेगा।
बाँस क्रांति कार्यक्रम: पूर्वोत्तर में बाँस की खेती और उत्पाद विकास पर केंद्रित एक व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया जाए।
इसमें बाँस से बने वस्त्रों से लेकर निर्माण सामग्री और जैव ईंधन तक सब कुछ शामिल किया जा सकता है।
पूर्वोत्तर भारत को एक संवहनीय ‘बाँस अर्थव्यवस्था’ (Bamboo Economy) का केंद्र बनाने से आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है और इस क्षेत्र को पर्यावरण-अनुकूल नवाचार में अग्रणी बनाया जा सकता है।
हिमालयी औषधीय अनुसंधान गलियारा (Himalayan Medicinal Research Corridor): पारंपरिक हिमालयी चिकित्सा (पूर्वोत्तर के ज्ञान को आयुर्वेद एवं आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के साथ एकीकृत करते हुए) के लिये एक विशेष अनुसंधान एवं विकास गलियारे का निर्माण किया जाए।
इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र वैकल्पिक चिकित्सा अनुसंधान एवं उत्पादन में वैश्विक अग्रणी क्षेत्र के रूप में स्थापित हो सकता है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और मुख्यधारा भारत के साथ इसका वैज्ञानिक एकीकरण हो सकेगा।
स्वायत्त वाहन परीक्षण स्थल: चुनौतीपूर्ण इलाकों में स्वायत्त वाहनों के परीक्षण के लिये पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों को परीक्षण क्षेत्र के रूप में नामित किया जाए। पूर्वोत्तर भारत का अनूठा भूदृश्य वैश्विक ऑटो एवं टेक कंपनियों को आकर्षित कर सकता है, जिससे यह क्षेत्र परिवहन प्रौद्योगिकी के भविष्य में एकीकृत हो सकता है।

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