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भारत का चिकित्सा अनुसंधान परिदृश्य

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भारत का चिकित्सा अनुसंधान परिदृश्य एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर है। देश के पास प्रतिभाशाली शोधकर्त्ताओं के बढ़ते समूह, नैदानिक परीक्षणों के लिये आदर्श एक समृद्ध विविध आबादी और वैज्ञानिक एवं तकनीकी उन्नति पर बढ़ते बल के रूप में निर्विवाद शक्ति मौजूद है।

हालाँकि, चिकित्सा अनुसंधान में नैतिक चूक जैसी चिंताओं ने स्वास्थ्य सेवा नवाचार में भारत की आकांक्षाओं पर एक लंबी छाया डाल रखी है। हाल ही में उभरे विवाद (जैसे कि भोपाल में कोवैक्सिन परीक्षण में कथित अनियमितताएँ) ने नैदानिक परीक्षणों और दवा विकास प्रक्रियाओं में प्रणालीगत मुद्दों को उजागर किया है। इसके अलावा, संस्थागत नैतिकता समितियों पर निष्क्रिय होने के आरोप लग रहे हैं, जबकि उन्हें नैतिक उल्लंघनों के विरुद्ध प्राथमिक सुरक्षा प्रहरी होना चाहिये था।

भारत के चिकित्सा अनुसंधान और नैदानिक परीक्षण परिदृश्य में व्यापक सुधार की तत्काल आवश्यकता है। इसमें नैदानिक विकास में विशेषज्ञता का निर्माण और विशेष रूप से कमज़ोर आबादी से सूचित सहमति प्राप्त करने के संबंध में नैतिक दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना शामिल होना चाहिये।

भारत में चिकित्सा अनुसंधान से संलग्न प्रमुख संगठन कौन-से हैं?
स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (Department of Health Research- DHR): यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन शीर्ष निकाय है, जो चिकित्सा, स्वास्थ्य, जैव चिकित्सा और चिकित्सा पेशे से संबंधित क्षेत्रों में नैदानिक परीक्षण एवं परिचालन अनुसंधान सहित बुनियादी, अनुप्रयुक्त और नैदानिक अनुसंधान के संसंवर्द्धन एवं समन्वय के लिये ज़िम्मेदार है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research- ICMR): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद जैव चिकित्सा अनुसंधान के सूत्रीकरण, समन्वयन और संवर्द्धन के लिये भारत में शीर्ष निकाय है।
भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drugs Controller General of India- DCGI): यह भारत में नई दवाओं और टीकों के नैदानिक परीक्षणों को मंज़ूरी देने के लिये उत्तरदायी राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण है।
भारत में चिकित्सा अनुसंधान में हाल ही में हुई प्रगतियाँ
विशिष्ट अनुसंधान संस्थानों का उदय: भारत उन्नत चिकित्सा अनुसंधान के लिये समर्पित संस्थानों की स्थापना कर रहा है, जिससे चिकित्सा विज्ञान के विशिष्ट क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है। ये संस्थान स्वास्थ्य सेवा के अत्याधुनिक क्षेत्रों में प्रगति को गति दे रहे हैं।
उदाहरण: फरीदाबाद में अवस्थित ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (THSTI) ने कोविड-19 के लिये डायग्नोस्टिक किट विकसित करने और उसे मान्य करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में भारत की बढ़ती क्षमताओं को प्रदर्शित करता है।
स्वदेशी स्वास्थ्य चुनौतियों पर बेहतर ध्यान: शोधकर्त्ता भारत के विशिष्ट स्वास्थ्य मुद्दों पर अधिकाधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, स्थानीय आवश्यकताओं को संबोधित कर रहे हैं और जनसंख्या के अनुरूप समाधान विकसित कर रहे हैं।
यह दृष्टिकोण उन क्षेत्रों में सफलता की ओर अग्रसर है, जिन्हें पहले वैश्विक अनुसंधान द्वारा उपेक्षित किया गया था।
उदाहरण: भारत बायोटेक द्वारा विकसित रोटावायरस वैक्सीन ‘रोटावैक’ विशेष रूप से भारतीय बच्चों में दस्त के एक प्रमुख कारण को संबोधित करता है, जो स्थानीय स्वास्थ्य समस्याओं को हल करने में देश की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
स्वास्थ्य सेवा में AI और बिग डेटा: AI और बिग डेटा एनालिटिक्स का एकीकरण भारत में चिकित्सा अनुसंधान में क्रांति ला रहा है।
ये प्रौद्योगिकियाँ अधिक सटीक निदान, वैयक्तिक उपचार और कुशल स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में सक्षम बना रही हैं।
उदाहरण: निरमाई हेल्थ एनालिटिक्स ने एक AI-आधारित ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग उपकरण विकसित किया है जो गैर-आक्रामक एवं लागत प्रभावी है और संसाधन-सीमित स्थिति में प्रारंभिक पहचान दरों में सुधार कर सकता है।
जीनोमिक्स क्रांति: भारत बड़े पैमाने पर जीनोमिक अध्ययनों में भाग ले रहा है, जो आनुवंशिक विविधता और स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को बेहतर ढंग से समझने में योगदान दे रहा है।
यह शोध भारतीय जनसंख्या के अनुरूप वैयक्तिक चिकित्सा पद्धति का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
उदाहरण: जीनोमएशिया 100K परियोजना, जिसमें एक महत्त्वपूर्ण भारतीय समूह शामिल है, का लक्ष्य एक व्यापक आनुवंशिक डेटाबेस तैयार करना है जो एशियाई आबादी के लिये विशिष्ट भविष्य के चिकित्सा अनुसंधान और उपचारों को सूचना-संपन्न करेगा।
टेलीमेडिसिन और दूरस्थ स्वास्थ्य देखभाल अनुसंधान: टेलीमेडिसिन के द्रुत अंगीकरण से न केवल स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच में सुधार हो रहा है, बल्कि अनुसंधान के लिये मूल्यवान डेटा भी सृजित हो रहा है।
यह प्रवृत्ति विविध भारतीय आबादी में स्वास्थ्य सेवा उपयोग पैटर्न और परिणामों पर अध्ययन को सक्षम बना रही है।
उदाहरण: भारत में अग्रणी टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म प्रैक्टो (Practo) अपने विशाल उपयोगकर्त्ता डेटा का लाभ उठाकर रोग पैटर्न और हेल्थकेयर-सीकिंग व्यवहारों के बारे में जानकारी प्रदान कर रहा है; इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान में योगदान दे रहा है।
भारत में चिकित्सा अनुसंधान से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ :
क्लिनिकल परीक्षणों से जुड़ी नैतिक चिंताएँ: भारत को क्लिनिकल परीक्षणों में नैतिक आचरण सुनिश्चित करने, विशेष रूप से भेद्य आबादी की सूचित सहमति एवं सुरक्षा के संबंध में, निरंतर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
ये चिंताएँ अनुसंधान की प्रगति में बाधा डाल सकती हैं और चिकित्सा अध्ययनों में जनता के भरोसे को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
उदाहरण: कोवैक्सिन परीक्षण को लेकर भोपाल में हाल ही में उभरा विवाद, जहाँ नैतिक उल्लंघन और भेद्य समूहों के शोषण के आरोप सामने आए।
अपर्याप्त वित्तपोषण और पुरानी पड़ चुकी अवसंरचना: सुधारों के बावजूद, भारत में कई शोध संस्थान अभी भी अपर्याप्त वित्तपोषण और पुरानी पड़ चुकी अवसंरचना से जूझ रहे हैं, जिससे अत्याधुनिक अनुसंधान करने की उनकी क्षमता सीमित हो रही है।
भारत का अनुसंधान एवं विकास पर व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.6% है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद को इसका लगभग 20% हिस्सा प्राप्त होता है।
चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका में अनुसंधान व्यय का 70% योगदान निजी क्षेत्र से प्राप्त होता है।
हालाँकि, 2019-20 में भारत का केवल 36% अनुसंधान व्यय ही निजी क्षेत्र से आया।
प्रतिभा पलायन और प्रतिभा प्रतिधारण की कमी: भारतीय प्रतिभा का विदेशी संस्थानों की ओर पलायन हो रहा है जहाँ प्रायः बेहतर सुविधाएँ, वित्तपोषण और करियर की संभावनाएँ उपलब्ध होती हैं।
प्रतिभाओं का यह पलायन देश की अनुसंधान क्षमता और नवाचार क्षमता को प्रभावित करता है।
उदाहरण: डॉ. राहुल पुरवार (जिन्होंने आईआईटी बॉम्बे में कैंसर के इलाज के लिये एक नवीन CAR-T सेल थेरेपी विकसित की थी) बेहतर सुविधाओं के लिये अपना शोध लेकर अमेरिका पलायन कर गए।
नियामक और नौकरशाही संबंधी बाधाएँ: जटिल और प्रायः धीमी नियामक प्रक्रियाएँ अनुसंधान परियोजनाओं और नैदानिक परीक्षणों में देरी का कारण बन सकती हैं, जिससे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान में घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय निवेश दोनों हतोत्साहित हो सकते हैं।
उदाहरण: स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन कोवैक्सिन के विकास को मानव परीक्षणों के लिये अनुमोदन प्राप्त करने में नियामक चुनौतियों के कारण आरंभिक असफलताओं का सामना करना पड़ा।
गैर-संचारी रोगों पर सीमित शोध: यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में गैर-संचारी रोगों (NCDs) के कारण होने वाली मौतों का अनुपात वर्ष 1990 में 37.9% से बढ़कर वर्ष 2016 में 61.8% हो गया है।
भारत में गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ के बावजूद, अनुसंधान का वित्तपोषण और ध्यान संक्रामक रोगों की ओर असंगत रूप से झुका हुआ है।
व्यावहारिक नैदानिक अनुप्रयोगों की उपेक्षा: यद्यपि भारत मूल्यवान चिकित्सा अनुसंधान करता है, फिर भी अनुसंधान निष्कर्षों और स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था में उनके व्यावहारिक कार्यान्वयन के बीच प्रायः एक विसंगति होती है।
उदाहरण: मातृ स्वास्थ्य परिणामों में सुधार लाने में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं (जैसे आशा) की प्रभावशीलता पर विभिन्न अध्ययनों के बावजूद आशा प्रशिक्षण एवं सहायता के लिये साक्ष्य-आधारित अभ्यासों का कार्यान्वयन विभिन्न राज्यों के बीच असंगत बना हुआ है, जिससे इस शोध का वास्तविक प्रभाव सीमित रह जाता है।
पारंपरिक चिकित्सा के एकीकरण पर अपर्याप्त अनुसंधान: भारत में पारंपरिक चिकित्सा के उपयोग की व्यापकता के बावजूद, इन अभ्यासों को आधुनिक चिकित्सा के साथ एकीकृत करने पर पर्याप्त गहन अनुसंधान नहीं हुआ है।
अश्वगंधा जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का उपयोग व्यापक है, लेकिन चिंता विकारों जैसी स्थितियों के लिये पारंपरिक उपचारों के साथ संयोजन में इसकी प्रभावकारिता और सुरक्षा स्थापित करने के लिये अच्छी तरह से डिज़ाइन किये गए नैदानिक परीक्षणों का अभाव है।
चिकित्सा अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये प्रमुख सरकारी पहलें:
आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन: यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है जिसका उद्देश्य शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्वास्थ्य अवसंरचना, निगरानी एवं स्वास्थ्य अनुसंधान में गंभीर अंतराल को दूर करना है।
फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार पर राष्ट्रीय नीति: इसका उद्देश्य फार्मास्यूटिकल्स और चिकित्सा उपकरणों में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना तथा इस क्षेत्र में नवाचार के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है ताकि भारत दवा खोज में अग्रणी बन सके।
मेडटेक प्रोडक्ट डेवलपमेंट एक्सीलरेशन गेटवे ऑफ इंडिया (mPRAGATI): यह चिकित्सा उपकरण और निदान मिशन सचिवालय (Medical Device and Diagnostics Mission Secretariat- MDMS) के तहत एक राष्ट्रीय केंद्र है, जो चिकित्सा उपकरणों और प्रौद्योगिकी के विकास के लिये भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) तथा स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) द्वारा प्रायोजित है।
चैंपियन सेवा क्षेत्र योजना: आयुष मंत्रालय ने पारंपरिक चिकित्सा में चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये चिकित्सा मूल्य यात्रा के लिये चैंपियन सेवा क्षेत्र योजना विकसित की है।
चिकित्सा स्वास्थ्य अनुसंधान को बेहतर बनाने के लिये क्या उपाय किये जा सकते हैं?
ब्लॉकचेन-आधारित अनुसंधान सहयोग मंच: अनुसंधान सहयोग के लिये एक राष्ट्रीय, ब्लॉकचेन-आधारित मंच विकसित करना’ पारदर्शी डेटा साझाकरण, क्रेडिट एट्रिब्यूशन और क्रॉस-इंस्टीट्यूशनल परियोजना प्रबंधन सुनिश्चित करना।
एथेरियम जैसी एक प्रणाली लागू करना, लेकिन जो अनुसंधान प्रोटोकॉल के लिये अनुकूलित हो।
इससे AIIMS दिल्ली और CMC वेल्लोर जैसे संस्थानों के बीच बहुकेंद्रीय अध्ययनों पर निर्बाध सहयोग को सक्षम कर सकता है और योगदान एवं डेटा अखंडता की स्वचालित ट्रैकिंग हो सकेगी।
AI-संचालित अनुसंधान प्राथमिकता: स्वास्थ्य डेटा, अनुसंधान आउटपुट और वित्तपोषण पैटर्न का विश्लेषण करने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करना, ताकि सेवा-वंचित अनुसंधान क्षेत्रों की पहचान की जा सके और संसाधन आवंटन को अनुकूलित किया जा सके।
उदाहरण: एक ऐसी AI प्रणाली विकसित करना जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, अकादमिक प्रकाशनों और वैश्विक स्वास्थ्य रुझानों से प्राप्त आँकड़ों को संयोजित कर उच्च प्रभावपूर्ण अनुसंधान प्राथमिकताओं का सुझाव दे (ठीक उसी तरह जैसे नेटफ्लिक्स एल्गोरिदम दर्शकों की प्राथमिकताओं का पूर्वानुमान लगाता है, लेकिन चिकित्सा अनुसंधान आवश्यकताओं के लिये)।
दवा खोज के लिये क्वांटम कंप्यूटिंग: दवा खोज और आणविक मॉडलिंग में तेज़ी लाने के लिये विशेष रूप से क्वांटम कंप्यूटिंग क्षमताओं में निवेश किया जाए।
IBM के क्वांटम नेटवर्क के समान एक राष्ट्रीय क्वांटम कंप्यूटिंग सुविधा की स्थापना की जाए, लेकिन भारत में प्रचलित बीमारियों के लिये प्रोटीन फोल्डिंग और ड्रग-टार्गेट अंतःक्रिया जैसी जटिल फार्मास्युटिकल चुनौतियों को हल करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
चिकित्सकों के लिये अनिवार्य अनुसंधान अवकाश: एक ऐसी प्रणाली लागू की जाए, जिसमें अभ्यासरत चिकित्सकों के लिये समय-समय पर अनुसंधान अवकाश लेना आवश्यक होगा, ताकि नैदानिक अभ्यास और अनुसंधान के बीच की खाई को पाटा जा सके।
एक ऐसा कार्यक्रम स्थापित किया जाए, जिसमें प्रत्येक पाँच वर्ष में चिकित्सक 2-3 माह अनुसंधान परियोजनाओं के लिये पूर्णतः समर्पित हों, जो अकादमिक अवकाश प्रणाली के समान हो, लेकिन स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों के लिये अनुकूलित हो।
वर्नाक्यूलर मेडिकल रिसर्च नेटवर्क: गैर-अंग्रेज़ी भाषी स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच भागीदारी और ज्ञान साझाकरण को बढ़ाने के लिये क्षेत्रीय भाषाओं में चिकित्सा अनुसंधान के संचालन एवं प्रसार के लिये एक राष्ट्रीय मंच विकसित करना।
बहुमूल्य नैदानिक अवलोकनों में योगदान देने और अपनी मूल भाषा में अत्याधुनिक अनुसंधान तक पहुँच बना सकने के लिये एक बहुभाषी पत्रिका और अनुसंधान डेटाबेस का शुभारंभ किया जाए।
जनजातीय ज्ञान एकीकरण कार्यक्रम: भारत के विविध जनजातीय समुदायों के पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण और उसे वैज्ञानिक रूप से मान्य करने के लिये एक व्यवस्थित कार्यक्रम का सृजन किया जाए तथा इसे आयुष नेक्स्ट डेटाबेस (Ayush Next Database) के साथ एकीकृत किया जाए।
नीलगिरी जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की जाए, जहाँ मानव विज्ञानियों को चिकित्सा शोधकर्त्ताओं के साथ जोड़कर टोडा जनजाति की अनूठी चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन किया जाए, ताकि पीड़ा प्रबंधन या घाव भरने के लिये संभावित रूप से नवीन यौगिकों की खोज हो सके।

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