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प्रवास: रुझान, चुनौतियाँ और समाधान

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प्रिलिम्स के लिये:

विश्व प्रवास रिपोर्ट, आंतरिक प्रवास, इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर माइग्रेशन, सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवासन के लिये ग्लोबल कॉम्पैक्ट, नीति आयोग, राष्ट्रीय प्रवासी श्रम नीति का मसौदा, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, एफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्पलेक्सेज़, ई-श्रम पोर्टल, कोविड​​-19, कृषि का नारीकरण, चालू खाता घाटा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, पीएम गरीब कल्याण योजना, मानव प्रवास, भारत में प्रवास रिपोर्ट 2020-21

मेन्स के लिये:

प्रवास का महत्त्व, प्रवास में बाधाएँ, प्रवास पर केंद्रित नीति की आवश्यकता।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फॉर माइग्रेशन (IOM) द्वारा जारी नवीनतम विश्व प्रवास रिपोर्ट (World Migration Report) इस बात की पुष्टि करती है कि भारत से संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब में होने वाला प्रवास शीर्ष 10 कंट्री-टू-कंट्री माइग्रेशन में शामिल है। भारत से पुरुष प्रवास कुल बाह्य प्रवास में लगभग 65% की हिस्सेदारी रखता है, जो दर्शाता है कि पुरुष प्रायः कार्य के लिये प्रवास करते हैं, जबकि महिलाएँ पीछे घर पर छूट जाती हैं।

वर्ष 2020 में भारत के लगभग 18 मिलियन लोग देश से बाहर रह रहे थे, जहाँ संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब सबसे बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी की मेजबानी करते हैं। आंतरिक प्रवास और बाह्य प्रवास, दोनों ही आम तौर पर बेहतर आजीविका की खोज से प्रेरित होते हैं।

प्रवास (Migration) क्या है?

  • परिचय:
    • इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (IOM) की परिभाषा के अनुसार, प्रवासी (migrant) वह व्यक्ति है जो अपने सामान्य निवास स्थान को छोड़कर अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पार या किसी राज्य के भीतर स्थानांतरित हो रहा है या स्थानांतरित हो चुका है।
    • पैमाना, दिशा, जनसांख्यिकी एवं आवृत्ति के संबंध में प्रवास में परिवर्तनों का विश्लेषण प्रभावशाली नीतियों, कार्यक्रमों और व्यावहारिक हस्तक्षेपों के विकास को सूचना-संपन्न कर सकता है।
  • प्रवास के रूप और स्वरूप:
    • आंतरिक प्रवास (Internal migration): यह देश के भीतर होता है और इसे उद्गम एवं गंतव्य के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसमें ग्रामीण-शहरी प्रवास, अंतः राज्यीय प्रवास और अंतर-राज्यीय प्रवास शामिल हैं।
    • बाह्य प्रवास (External Migration): इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रवास के रूप में भी जाना जाता है, जहाँ व्यक्ति या परिवार एक देश से दूसरे देश में जाते हैं। यह विभिन्न कारकों से प्रेरित हो सकता है, जिसमें आर्थिक अवसर (जैसे भारतीय आईटी पेशेवरों का संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवास या भारतीय निर्माण श्रमिकों का GCC देशों में प्रवास), शिक्षा, परिवार का पुनर्मिलन या उत्पीड़न अथवा संघर्ष से बचने के लिये शरण की मांग करना (जैसे बांग्लादेश में रोहिंग्या) आदि शामिल हैं।
      • भारत से विश्व के विभिन्न भागों में उत्प्रवासन (Emigration)।
      • विभिन्न देशों से लोगों का भारत में आप्रवास (Immigration)।
    • विवशतापूर्ण प्रवास (Forced migration): यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब युद्ध, उत्पीड़न या प्राकृतिक आपदाओं जैसे कारकों के कारण व्यक्ति या परिवार पलायन के लिये विवश होते हैं।
    • स्वैच्छिक प्रवास (Voluntary migration): यह वह स्थिति है जब व्यक्ति या परिवार प्रायः बेहतर आर्थिक संभावनाओं या जीवन की बेहतर गुणवत्ता की इच्छा से प्रेरित होकर दूसरे क्षेत्र की ओर पलायन करते हैं।
    • अस्थायी प्रवास (Temporary migration): यह संक्षिप्त अवधि का होता है, जैसे मौसमी या अस्थायी कार्य, जबकि स्थायी प्रवास में एक नए स्थान पर स्थायी रूप से बस जाना शामिल होता है।
    • उलट प्रवास या ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (Reverse migration): यह उस स्थिति को संदर्भित करता है जहाँ व्यक्ति या परिवार पहले कहीं और प्रवास करने के बाद अब अपने मूल देश या मूल निवास स्थान पर लौट रहे हैं।

 

प्रवास के विभिन्न कारण कौन-से हैं?

  • आर्थिक कारक:
    • प्रतिकर्ष कारक (Push Factors): गरीबी, निम्न उत्पादकता और बेरोज़गारी जैसी आर्थिक कठिनाइयाँ ‘पुश फैक्टर’ के रूप में कार्य करती हैं और लोगों को अपने वर्तमान निवास क्षेत्र से पलायन के लिये प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिये, बार-बार सूखे के कारण कम पैदावार का संकट झेल रहे महाराष्ट्र के किसान निर्माण या सेवा क्षेत्र में रोज़गार के लिये पुणे या मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन का विकल्प चुन रहे हैं।
    • अपकर्ष कारक (Pull Factors): दूसरी ओर, बेहतर रोज़गार अवसर, उच्च वेतन और जीवन की बेहतर गुणवत्ता की संभावनाएँ ‘पुल फैक्टर’ के रूप में कार्य करती हैं और लोगों को नए स्थान पर जाने के लिये आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिये, उत्तर प्रदेश के किसी गाँव से एक युवा स्नातक उच्च वेतन और शहर में बेहतर जीवन के अवसर के कारण नोएडा या गुरुग्राम की ओर पलायन कर सकता है।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक कारक:
    • प्रवास सामाजिक कारकों, जैसे विवाह, परिवार के पुनर्मिलन या अपने समुदाय या सामाजिक नेटवर्क के निकट रहने की इच्छा से प्रभावित हो सकता है।
    • इसके उदाहरणों में विवाह के कारण या जाति-आधारित भेदभाव एवं हिंसा से बचने के लिये होने वाला प्रवास शामिल है।
  • सांस्कृतिक कारक:
    • लोग उन क्षेत्रों में प्रवास कर सकते हैं जहाँ उनकी सांस्कृतिक प्रथाओं, परंपराओं एवं मान्यताओं का सम्मान और संरक्षण किया जाता है।
    • उदाहरण के लिये, एक समुदाय ऐसे क्षेत्र में प्रवास कर सकता है जहाँ उनके जातीय या धार्मिक समूह की सुदृढ़ उपस्थिति है, जिससे उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की अनुमति मिलती है।
  • राजनीतिक कारक:
    • राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष और उत्पीड़न व्यक्तियों को सुरक्षा की तलाश में पलायन करने के लिये विवश कर सकते हैं।
    • सरकारी नीतियाँ, प्रशासनिक कार्रवाई और अलगाववादी आंदोलन जैसे कारक भी प्रवास स्वरूप को प्रभावित कर सकते हैं।
  • पर्यावरणीय कारक:
    • प्राकृतिक आपदा, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, वनों की कटाई, जल की कमी आदि के कारण घरों, आजीविका एवं संसाधनों की हानि के परिदृश्य में भी पलायन हो सकता है।
    • प्रभावित आबादी सुरक्षा, संवहनीयता और बेहतर जीवन दशाओं की तलाश में पलायन करने के लिये मजबूर हो सकती है।
      • कुछ अनुमानों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण वर्ष 2050 तक भारत में लगभग 45 मिलियन लोग पलायन के लिये विवश हो सकते हैं।
  • विकास परियोजनाएँ: नर्मदा बाँध परियोजना और केन बेतवा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट जैसी परियोजनाओं ने पलायन को बढ़ावा दिया है।
    • उदाहरण के लिये, नर्मदा नदी पर एक बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजना ‘सरदार सरोवर परियोजना’ ने 40,000 से अधिक परिवारों को विस्थापित किया है, जिनमें मुख्य रूप से गुजरात, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के 245 गाँवों के जनजातीय परिवार शामिल हैं।

 

प्रवास से संबद्ध विभिन्न प्रभाव 

  • सकारात्मक प्रभाव:
    • आर्थिक विकास:
      • प्रवास श्रम अंतराल को दूर कर, उत्पादकता को बढ़ाकर और उपभोक्ता व्यय में वृद्धि कर आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है।
      • प्रवास के परिणामस्वरूप प्रवासियों से धन-प्रेषण (remittances) प्राप्त होता है, जो उद्गम क्षेत्र के लिये विदेशी मुद्रा के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है।
      • वर्ष 2022 में भारत विश्व में धन-प्रेषण का सबसे बड़ा प्राप्तकर्त्ता था, जिसने 111 बिलियन डॉलर से अधिक प्राप्त किया, जिससे देश के चालू खाता घाटे को कम करने में मदद मिली।
    • सामाजिक प्रभाव:
      • प्रवासी सामाजिक परिवर्तन के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं, जो शहरी क्षेत्र से ग्रामीण क्षेत्रों तक परिवार नियोजन और शिक्षा जैसे नए विचारों एवं प्रौद्योगिकियों के प्रसार को सुगम बनाते हैं।
    • सांस्कृतिक विविधता:
      • प्रवास सांस्कृतिक विविधता को भी बढ़ावा देता है और मिश्रित संस्कृतियों के विकास में योगदान देता है, जिससे लोगों का दृष्टिकोण व्यापक होता है।
      • प्रवास विभिन्न भाषाओं और परंपराओं को साथ लाकर रचनात्मकता एवं सहिष्णुता को बढ़ावा देते हुए समाज को समृद्ध बनाता है।
    • जीवन की गुणवत्ता में सुधार:
      • प्रवास से रोज़गार के अवसर और आर्थिक ख़ुशहाली की वृद्धि होती है, जिससे प्रवासियों के जीवन की समग्र गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
    • नवाचार:
      • प्रवासी प्रायः नए विचार, कौशल एवं प्रौद्योगिकियाँ लेकर आते हैं, जिससे मेजबान देशों में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलता है।
    • श्रम बाज़ार में लचीलापन:
      • प्रवास से श्रम आपूर्ति और मांग को संतुलित करने में, विशेष रूप से कुशल श्रमिकों की कमी का सामना करने वाले क्षेत्रों में, मदद मिल सकती है।
  • नकारात्मक प्रभाव:
    • जनसांख्यिकीय प्रभाव:
      • प्रवास किसी देश के भीतर जनसंख्या पुनर्वितरण का कारण बनता है, विशेष रूप से शहरी जनसंख्या वृद्धि में योगदान देता है। ग्रामीण क्षेत्रों से चयनात्मक बाह्य प्रवास या ‘आउट-माइग्रेशन’ (out-migration) विशेष रूप से आयु एवं कौशल वितरण के संदर्भ में नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है और कृषि के नारीकरण (feminization of agriculture) को बढ़ावा दे सकता है।
    • पर्यावरणीय प्रभाव:
      • ग्रामीण-शहरी प्रवास से शहरी क्षेत्रों में भीड़भाड़ बढ़ती है, मौजूदा अवसंरचना पर दबाव पड़ता है और इसके परिणामस्वरूप अनियोजित शहरी विकास एवं मलिन बस्तियों के उदय की स्थिति बनती है। उदाहरण के लिये, मुंबई की विशाल मलिन बस्ती आबादी (जो शहर की लगभग आधी आबादी है) ग्रामीण-शहरी प्रवास का प्रत्यक्ष परिणाम है।
      • अनियोजित बस्तियों के कारण बढ़ती यातायात भीड़ और अनौपचारिक अपशिष्ट निपटान पर निर्भरता भारतीय शहरों में वायु एवं मृदा प्रदूषण में उल्लेखनीय योगदान देती है।
    • सामाजिक तनाव:
      • प्रवास सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है, जिसमें नौकरियों, आवास और सामाजिक सेवाओं के लिये प्रतिस्पर्द्धा, साथ ही सांस्कृतिक संघर्ष एवं भेदभाव शामिल हैं।
      • प्रवास के कारण पारिवारिक अलगाव एवं भावनात्मक संकट पैदा हो सकता है और सामाजिक नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है (विशेष रूप से तब जब परिवार के सदस्य उद्गम देश में पीछे रह जाते हैं)।

भारत में प्रवास संबंधी विभिन्न आँकड़े 

  • भारत में प्रवास रिपोर्ट 2020-21:
    • सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की जून 2022 की रिपोर्ट में अस्थायी आगंतुकों (temporary visitors) और प्रवासियों के लिये डेटा संकलित किया गया है। जुलाई 2020 से जून 2021 तक लगभग 0.7% आबादी अस्थायी आगंतुकों के रूप में दर्ज की गई थी।
    • इसी अवधि में अखिल भारतीय प्रवास दर 28.9% थी, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 26.5% तथा शहरी क्षेत्रों में 34.9% थी।
    • महिलाओं की प्रवास दर 47.9% (ग्रामीण क्षेत्रों में 48% एवं शहरी क्षेत्रों में 47.8%) और पुरुषों की प्रवास दर 10.7% (ग्रामीण क्षेत्रों में 5.9% एवं शहरी क्षेत्रों में 22.5%) दर्ज की गई।
    • 86.8% महिला प्रवासियों ने विवाह के कारण पलायन किया, जबकि 49.6% पुरुष प्रवासियों ने रोज़गार की तलाश में पलायन किया।
  • वर्ष 2011 की जनगणना:
    • भारत में लगभग 45.36 करोड़ आंतरिक प्रवासी (internal migrants) थे, जो जनसंख्या के लगभग 37% भाग का प्रतिनिधित्व करते थे।
    • वार्षिक शुद्ध प्रवास प्रवाह (Annual net migrant flows) कार्यशील आयु आबादी के लगभग 1% का प्रतिनिधित्व कर रहा था। देश के कार्यबल का 48.2 करोड़ होने का अनुमान लगाया गया था, जिसके वर्ष 2016 तक 50 करोड़ को पार कर जाने का आकलन किया गया।
  • प्रवास पर कार्यसमूह की रिपोर्ट, 2017:
    • भारत के कुल पुरुष ‘आउट-माइग्रेशन’ में शीर्ष 25% के लिये 17 ज़िले जिम्मेदार हैं, जिनमें से 10 उत्तर प्रदेश में, 6 बिहार में और 1 ओडिशा में है।

भारत में प्रवास से संबद्ध विभिन्न चुनौतियाँ कौन-सी हैं?

  • अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य लाभ: प्रवासी श्रमिकों के पास प्रायः आवश्यक सामाजिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा लाभों तक पहुँच की कमी होती है और कार्यस्थलों में न्यूनतम सुरक्षा मानकों के कानूनों का प्रवर्तन नहीं होता है, जिससे उन्हें असुरक्षित कार्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिये, शहरी क्षेत्रों में प्रवासी निर्माण श्रमिकों के पास उचित सुरक्षा उपकरण तक पहुँच की कमी हो सकती है, जिससे दुर्घटनाओं एवं चोटों के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
    • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (2021-2022) के अनुसार, भारत में नियमित रूप से नियोजित गैर-कृषि श्रमिकों (जिनमें प्रवासी श्रमिक, स्व-नियोजित व्यक्ति और घर से कार्य करने वाले लोग शामिल हैं) में से आधे से अधिक (53%) के पास सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं हैं।
  • राज्य-प्रदत्त लाभों की सीमित सुवाह्यता: प्रवासी श्रमिकों को राज्य-प्रदत्त लाभों, विशेष रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से वितरित आवश्यक खाद्य आपूर्ति तक पहुँच में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिये, प्रवासी कृषि श्रमिकों को निवास स्थान संबंधी शर्तों के कारण अपने गंतव्य राज्यों में सब्सिडीयुक्त खाद्यान्न तक पहुँच में संघर्ष करना पड़ सकता है ।
  • सस्ते आवास और बुनियादी सुविधाओं की कमी: शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करने वाले प्रवासी श्रमिकों को प्रायः सस्ते आवास प्राप्त करने और स्वच्छ जल, स्वच्छता सुविधाओं एवं बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उपयुक्त आवास और अवसंरचना तक पहुँच की कमी उनकी असुरक्षा में योगदान करती है तथा गरीबी के दुष्चक्र को बनाए रखती है।
  • कोविड-19 महामारी के प्रभाव: कोविड-19 महामारी ने प्रवासी श्रमिकों के समक्ष विद्यमान चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। उदाहरण के लिये, लॉकडाउन के दौरान शहरी केंद्रों में फँसे प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों को आय की हानि और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच की कमी के कारण भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
  • शोषण और भेदभाव: प्रवासी श्रमिकों में श्रम बाज़ार में शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। प्रवासी स्थिति, जातीयता या भाषा के आधार पर उन्हें कम मज़दूरी, खतरनाक कार्य दशा और भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
    • देश में प्रवासी श्रमिकों के साथ हिंसा और भेदभाव के मामले राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आते रहे हैं।
      • वर्ष 2008 में महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासियों पर हुए हमले इसके भयावह उदाहरण हैं।

प्रवास के संबंध में प्रमुख सरकारी पहलें

  • नीति आयोग द्वारा वर्ष 2021 में पेश राष्ट्रीय प्रवासी श्रम नीति के मसौदे में प्रवासियों को बेहतर दशाओं के लिये सौदेबाजी कर सकने में मदद करने के लिये सामूहिक कार्रवाई के महत्व पर चर्चा की गई।
  • इसके अतिरिक्त, एफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्सेज़ (ARHC) और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना की शुरुआत के साथ-साथएक राष्ट्र- एक राशन कार्ड (ONORC) परियोजना का विस्तार किया गया है।
  • ई-श्रम पोर्टल का शुभारंभ भी प्रवासियों की स्थिति के लिये आशाजनक है।
  • सामाजिक सुरक्षा पर संहिता भी अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों के लिये बीमा एवं भविष्य निधि जैसे कुछ लाभ प्रदान करती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रवास और वैश्विक कार्रवाई:
    • वर्ष 2016 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने शरणार्थियों की बड़ी आवाजाही को संबोधित करने के लिये एक उच्चस्तरीय पूर्ण बैठक का आयोजन किया और “सुरक्षा एवं गरिमा: शरणार्थियों एवं प्रवासियों की बड़ी आवाजाही को संबोधित करना” (Safety and Dignity: Addressing Large Movements of Refugees and Migrants) शीर्षक रिपोर्ट तैयार की।
    • संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने ‘शरणार्थियों और प्रवासियों पर न्यूयॉर्क घोषणा’ (New York Declaration for Refugees and Migrants) को अंगीकृत किया है, जो सभी प्रवासियों की, चाहे उनकी प्रवासी स्थिति कुछ भी हो, सुरक्षा, गरिमा, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिये प्रतिबद्ध है।
    • न्यूयॉर्क घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवास के लिये वैश्विक समझौते (Global Compact for Safe, Orderly and Regular Migration) के विस्तार में सहयोग करने पर सहमति व्यक्त की। इस समझौते को दिसंबर 2018 में मोरक्को में आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रवास पर अंतर-सरकारी सम्मेलन’ में अंगीकृत किया गया था।
    • प्रत्येक वर्ष 8 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी दिवस (International Migrants Day) के रूप में मनाया जाता है।

प्रवास की चुनौतियों से निपटने के लिये क्या किया जाना चाहिये?

  • व्यापक सामाजिक सुरक्षा उपायों को शामिल करना:
    • बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करना: प्रवासियों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए, जिसमें आवास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा एवं रोज़गार तक पहुँच शामिल है, चाहे उनकी प्रवास स्थिति कुछ भी हो। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) जैसी पहलें शहरी क्षेत्रों में आवास सुविधाएँ प्रदान करने और ‘वन नेशन – वन राशन कार्ड’ प्रवासियों की एकीकृत खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य रखती हैं।
    • एकीकरण और समावेशन: प्रवासियों के समाज में एकीकरण एवं समावेशन को बढ़ावा दिया जाए, जहाँ सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाया जाए और भेदभाव एवं ज़ीनोफोबिया (बाहरी व्यक्तियों के प्रति विद्वेष) को कम किया जाए।
  • कौशल विकास और रोज़गार सृजन: रोज़गार क्षमता बढ़ाने और गाँवों में रोज़गार अवसर पैदा करने के लिये ग्रामीण कौशल पहल में निवेश करने से कार्य की तलाश में प्रवास की आवश्यकता कम हो सकती है। ‘स्किल इंडिया मिशन’ और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम प्रवासियों को सशक्त बनाने में मदद कर सकते हैं।
  • ‘काउंटर-मैग्नेट सीटीज़’ (Counter Magnet Cities): सरकारों को क्षेत्रीय शहरों की अवसंरचना, सुविधाओं और आर्थिक अवसरों में निवेश कर संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना चाहिए और रोज़गार के अवसर, सस्ते आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएँ एवं बेहतर जीवन स्तर प्रदान करने के रूप में प्रमुख शहरी केंद्रों पर दबाव को कम करना चाहिए।
    • जनसंख्या वृद्धि के कुछ शहरों में केंद्रित रहने के बजाय कई शहरों में विस्तृत करने के रूप में ये काउंटर-मैग्नेट शहर भीड़भाड़ को कम करने, संसाधनों पर दबाव को कम करने और अत्यधिक आबादी वाले क्षेत्रों में अवसंरचना पर बोझ को कम करने में मदद करते हैं।
  • श्रम बाज़ार संबंधी नीतियाँ: श्रम बाज़ार संबंधित नीतियाँ विकसित की जाएँ जो उचित मज़दूरी, सुरक्षित कामकाजी दशाओं और सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुँच सहित विभिन्न प्रवासी श्रमिकों अधिकारों की रक्षा करें।
  • विनियमन और श्रमिक सुरक्षा: प्रवासी श्रमिकों को शोषण से बचाने के लिये श्रम कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए। इसमें उचित वेतन, सुरक्षित कामकाजी दशा और उचित शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित करना शामिल है।

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