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पाषाण युग में लकड़ी की कलाकृतियाँ

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चर्चा में क्यों? 

हाल ही में हुए अध्ययन द्वारा पारंपरिक पाषाण युग के दृष्टिकोण को चुनौती दी गई है, यह सुझाव देते हुए कि इसे ‘काष्ठ युग’ कहना अधिक उपयुक्त हो सकता है।

  • यह परिप्रेक्ष्य जर्मनी के शॉनिंगन में 300,000 से 400,000 वर्ष पुरानी लकड़ी की कलाकृतियों की खोज और विश्लेषण द्वारा उत्पन्न हुआ है।
  • हाल ही में मध्य प्रदेश के घुघवा में प्रागैतिहासिक कलाकृतियों की खोज से पता चलता है कि प्राचीन शिकारी-संग्राहक औजार बनाने के लिये जीवाश्म लकड़ी का उपयोग करते थे, जो अनुमानतः 10,000 वर्ष से अधिक पुरानी है, जिसमें उसी क्षेत्र में पाए गए मध्यम आकार के टुकड़े और माइक्रोलिथ शामिल हैं।
नोट:

  • भारत और जर्मनी में मानव उपस्थिति हजारों साल पुरानी है, जहाँ नर्मदा घाटी में 1.5 मिलियन वर्ष पुराने पत्थर के औजार और राइन घाटी में 800,000 वर्ष पुराने पत्थर के औजार पाए गए हैं।

लकड़ी के औज़ार पाषाण युग के विचारों को कैसे चुनौती देते हैं?

  • परिष्कृत लकड़ी के उपकरण: कलाकृतियों ने साधारण नुकीली छड़ियों से परे लकड़ी की तकनीक की एक विविध शृंखला का प्रदर्शन किया।
  • प्रारंभिक मानव व्यवहार और क्षमताएँ: शिकार के प्राचीन औजारों की खोज से इस विचार पर संदेह पैदा होता है कि ये लोग केवल सफाई कर्मी (scavengers) थे, तथा इससे यह पता चलता है कि वे पहले से योजना बनाने, रणनीतिक रूप से शिकार करने तथा औजारों की मरम्मत और पुनः उपयोग करने में सक्षम थे।
  • संरक्षण पूर्वाग्रह: शोध से पता चलता है कि पुरातत्त्व में कार्बनिक पदार्थों के बजाय पत्थर को संरक्षित करने का पूर्वाग्रह है, जो प्रागैतिहासिक काल में लकड़ी की प्रासंगिकता के संदर्भ में हमारी समझ को विकृत कर सकता है, बावजूद इसके कि संरक्षित लकड़ी की कलाकृतियाँ इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका का  प्रदर्शन करती हैं।

 

पाषाण युग क्या है?

  • पाषाण युग लगभग 3.4 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ, जब आधुनिक इथियोपिया में होमिनिड्स ने सर्वप्रथम पत्थर के औज़ारों का उपयोग किया। यह अवधि लगभग 6,000 से 4,000 वर्तमान से पूर्व (Before Present- BP) तक रही, मानव इतिहास का 99% हिस्सा है।
  • भारत में पाषाण युग: भारत में पाषाण युग के दौरान, उपलब्ध विविध भूभागों, जल, पौधों व पशुओं के कारण लोग हिमालय और सिंधु-गंगा के मैदानों को छोड़कर देशभर में रहने में सक्षम थे। भारतीय पुरापाषाण काल को तीन विकासात्मक चरणों में वर्गीकृत किया गया है:
    • निम्न पुरापाषाण काल (600,000 वर्ष ईसा पूर्व से 150,000 वर्ष ईसा पूर्व): इसमें चॉपर और काटने के उपकरण, हाथ की कुल्हाड़ी, क्लीवर, चाकू आदि बनाने के लिये बड़े कंकड़ अथवा गुच्छे का उपयोग किया जाता था। निम्न पुरापाषाण काल में औजारों के निर्माण की दो सांस्कृतिक परंपराएँ थीं:
      • सोनियन कंकड़-उपकरण परंपरा
      • प्रायद्वीपीय भारतीय हस्त कुल्हाड़ी-क्लीवर परंपरा।
    • मध्य पुरापाषाण काल (165,000 ईसा पूर्व से 31,000 वर्ष ईसा पूर्व): यह स्क्रेपर्स, पॉइंट्स, बोरर्स और अन्य उपकरण तैयार करने के लिये कोर से निकाले गए विभिन्न प्रकार के फ्लेक्स के उपयोग पर आधारित है।
    • उच्च पुरापाषाण काल (40,000 वर्ष ईसा पूर्व से 12,000 वर्ष ईसा पूर्व): इस चरण में हुए सुधारों में पंच तकनीक का उपयोग करके विभिन्न प्रकार के उपकरण जैसे ब्लंटेड ब्लेड, पेननाइफ ब्लेड, दाँतेदार किनारों वाले ब्लेड और लंबे समानांतर-पक्षीय ब्लेड से तीर बिंदु बनाना शामिल था।
  • मध्य पाषाण कालीन संस्कृति: इस युग के दौरान, लोग अर्द्ध-स्थायी और अस्थायी बस्तियों में रहते थे, गुफाओं व खुले क्षेत्रों का उपयोग करते थे, दफन अनुष्ठानों (Burial Rituals) का अभ्यास करते थे, कलात्मक क्षमताओं का प्रदर्शन करते थे, सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखते थे तथा छोटे शिकार के शिकार के लिये सूक्ष्म पाषाण उपकरणों का उपयोग करते थे।
  • नवपाषाण काल: इसने कृषि और पशुपालन की शुरुआत को चिह्नित किया। 
    • नवपाषाण संस्कृति के प्रारंभिक प्रमाण मिस्र और मेसोपोटामिया के उपजाऊ अर्धचंद्र क्षेत्र, सिंधु क्षेत्र, भारत की गंगा घाटी व चीन में भी पाए गए हैं।

 

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये : (2021)

(ऐतिहासिक स्थान)  :    (ख्याति का कारण)

  1. बुर्ज़होम               :         शैलकृत देव मंद

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