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दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकारों का संरक्षण

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यह एडिटोरियल 17/04/2024 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Navigating life as a consumer with disability” लेख पर आधारित है। इसमें व्यवसायों और सरकार के बीच एक सुदृढ़ कानूनी ढाँचे और सहयोग की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। यह सहयोग दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिये आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित हो कि उन्हें बाज़ार और समाज में समान अवसर प्राप्त हो।

प्रिलिम्स के लिये:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019, राष्ट्रीय उपभोक्ता अधिकार दिवस, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, उपभोक्ता संरक्षण (प्रत्यक्ष बिक्री) नियम, 2021, ई-दाखिल पोर्टल, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (NCH), दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016।

मेन्स के लिये:

दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा और संबंधित मुद्दे, दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकारों को बनाए रखने से संबंधित चुनौतियाँ।

प्रत्येक वर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस (World Consumer Rights Day) के रूप में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर उपभोक्ताओं के अधिकारों एवं ज़िम्मेदारियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। हालाँकि, उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े उत्सवों और चर्चाओं के बीच प्रायः उपभोक्ताओं का एक ऐसा भी समूह है, यानी दिव्यांगजन, जिसकी उपेक्षा कर दी जाती है। उपभोक्ता जनसांख्यिकीय के भीतर उनकी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद, दिव्यांग उपभोक्ता प्रायः उपभोक्ता अधिकारों की पहल के विमर्श और व्यावहारिक कार्यान्वयन दोनों में स्वयं को हाशिये पर पाते हैं। यह अदृश्यता या अनदेखी बाज़ार में दिव्यांग उपभोक्ताओं के समक्ष विद्यमान विशिष्ट चुनौतियों एवं बाधाओं को दूर करने की दिशा में अधिक ध्यान एवं समावेशिता की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

दिव्यांगजनों को बेहद बुनियादी मानवीय गतिविधियों के लिये भी मदद मांगने के संघर्ष का सामना करना पड़ता है और इसके परिणामस्वरूप वे गरिमा, स्वतंत्रता एवं निजता की हानि का शिकार होते हैं। उपभोक्ता के रूप में वे जिस व्यापक दुर्गमता का सामना करते हैं, वह न केवल स्वतंत्र जीवन जीने के उनके अधिकार को कमज़ोर करती है, बल्कि उन्हें दूसरों के समान समाज में भागीदारी से भी अवरुद्ध करती है।

दिव्यांग उपभोक्ताओं (Consumers With Disabilities- CwDs) से संबंधित विभिन्न पहलू: 

जनसांख्यिकीय और सांख्यिकीय अवलोकन:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 1 बिलियन से अधिक लोग (वैश्विक आबादी का 15%) किसी न किसी रूप में दिव्यांगता के साथ जी रहे हैं। भारत में, वर्ष 2011 की जनगणना में दिव्यांगजनों की संख्या 26.8 मिलियन दर्ज की गई, जो कुल जनसंख्या का 2.21% है।

दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकार:

  • समान व्यवहार:
    • दिव्यांग उपभोक्ताओं को बाज़ार में समान व्यवहार पाने का अधिकार है। इसमें उनकी दिव्यांगता के आधार पर किसी भेदभाव किये बिना दूसरों के साथ समान आधार पर वस्तुओं, सेवाओं और सुविधाओं तक पहुँच पाना शामिल है।
  • गैर-भेदभाव:
    • व्यवसायों को वस्तुओं, सेवाओं और रोज़गार के अवसरों के प्रावधान में दिव्यांग उपभोक्ताओं के साथ भेदभाव करने से प्रतिबंधित किया गया है। इसमें दिव्यांगता के आधार पर सेवा से इनकार करने, घटिया सेवा प्रदान करने या अधिक मूल्य वसूलने पर रोक शामिल है।

 

  • अभिगम्यता:
    • दिव्यांग उपभोक्ताओं को उत्पादों, सेवाओं और सार्वजनिक स्थानों की अभिगम्यता का अधिकार प्राप्त है। इसमें भौतिक अभिगम्यता (जैसे रैंप और लिफ्ट), संचार अभिगम्यता (जैसे सांकेतिक भाषा दुभाषिये की उपस्थिति या अभिगम्य वेबसाइटें) और सूचना अभिगम्यता (जैसे दस्तावेजों के अभिगम्य प्रारूप) शामिल हैं।
  • सहायक परिवेश (Accommodation):
    • व्यवसायों को यह सुनिश्चित करने के लिये सहायक परिवेश के निर्माण की आवश्यकता है कि दिव्यांग उपभोक्ता उनकी वस्तुओं और सेवाओं तक पहुँच बना सकें। इसमें दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिये नीतियों, अभ्यासों या प्रक्रियाओं को संशोधित करना शामिल हो सकता है।
  • निजता:
    • दिव्यांग उपभोक्ताओं को व्यवसायों के साथ अंतःक्रिया में निजता एवं गोपनीयता का अधिकार प्राप्त है। उनकी दिव्यांगता से संबंधित व्यक्तिगत सूचना के प्रति संवेदनशील व्यवहार किया जाना चाहिये और इसे अनधिकृत प्रकटीकरण से संरक्षित किया जाना चाहिये।
  • अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे:
    • दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCRPD):
      • वर्ष 2006 में अंगीकृत UNCRPD एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय संधि है जो दिव्यांगजनों के अधिकारों एवं गरिमा को बढ़ावा देती है। यह दिव्यांगजनों द्वारा सभी मानवाधिकारों और मूल स्वतंत्रता का पूर्ण एवं समान उपभोग कर सकना सुनिश्चित करती है।
    • दिव्यांगजनों के लिये अवसरों की समानता पर मानक नियम:
      • वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा अंगीकृत ये नियम दिव्यांगजनों के अधिकारों और समावेशन को सुनिश्चित करने के लिये विश्व के देशों को एक रूपरेखा प्रदान करते हैं। ये नियम अभिगम्यता, शिक्षा, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास जैसे क्षेत्रों को कवर करते हैं।
  • भारत में मौजूद राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे:
    • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016:
      • यह भारत में प्राथमिक कानून है जो दिव्यांगजनों के अधिकारों और हक़दारी (entitlements) की रक्षा करता है। यह 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को परिभाषित करता है और निर्मित वातावरण, परिवहन, सूचना एवं संचार के लिये अभिगम्यता मानकों को निर्दिष्ट करता है। यह अधिनियम उच्च शिक्षा और सरकारी रोज़गार में आरक्षण के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा उपायों का भी प्रावधान करता है।
    • दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995:
      • यह भारत में मौजूद प्रमुख दिव्यांगता संबंधी कानून था, जिसे बाद में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। इसने 7 प्रकार की दिव्यांगताओं की पहचान की थी और निवारण, पुनर्वास एवं बाधा-मुक्त वातावरण के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया था।
  • अन्य प्रासंगिक कानून:
    • भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 – यह पुनर्वास संबंधी पेशेवरों के प्रशिक्षण को विनियमित करता है और इसकी निगरानी करता है।
    • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 – यह मानसिक बीमारी रखने वाले व्यक्तियों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करता है।
    • ऑटिज़्म, सेरेब्रल पॉल्सी, मानसिक मंदता और बहुदिव्यांगता वाले व्यक्तियों के कल्याण के लिये राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 – यह निर्दिष्ट दिव्यांगजनों के कल्याण और सशक्तीकरण के लिये प्रावधान प्रदान करता है।
  • नीतियाँ और योजनाएँ:
    • सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) इसका उद्देश्य निर्मित वातावरण, परिवहन और सूचना एवं संचार में सुगम्यता या अभिगम्यता को बढ़ाना है।
    • विशिष्ट दिव्यांगता पहचान (Unique Disability ID- UDID) परियोजना – यह सरकारी लाभों और सेवाओं की बेहतर डिलीवरी को सक्षम करने हेतु दिव्यांगजनों के लिये एक राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण करता है।

दिव्यांग उपभोक्ताओं (CwDs) के समक्ष विद्यमान विभिन्न चुनौतियाँ: 

  • भौतिक एवं अभिगम्यता संबंधी बाधाएँ:
    • दुर्गम्य निर्मित वातावरण (जैसे रैंप, लिफ्ट और चौड़े डोरवे की कमी), जो उनकी गतिशीलता और भौतिक स्थानों तक स्वतंत्र पहुँच को अवरुद्ध करता है।
    • अपर्याप्त सुगम्य परिवहन विकल्प, जो आवागमन और वस्तुओं एवं सेवाओं तक पहुँच की उनकी क्षमता को बाधित करते हैं। उनके दैनिक जीवन और उपभोक्ता गतिविधियों में सहायता के लिये सहायक प्रौद्योगिकियों (assistive technologies) और अनुकूली उपकरणों (adaptive devices) का अभाव है।
      • सहायक प्रौद्योगिकियों का वैश्विक बाज़ार वर्ष 2024 तक 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जो इस उपभोक्ता खंड की उल्लेखनीय आर्थिक क्षमता को परिलक्षित करता है।
  • सूचना और संचार संबंधी बाधाएँ:
    • दृश्य, श्रवण या संज्ञानात्मक निःशक्तता वाले दिव्यांगजनों के लिये वैकल्पिक प्रारूपों (जैसे ब्रेल, ऑडियो, सांकेतिक भाषा) में सूचना की अनुपलब्धता की स्थिति पाई जाती है। ऐसी वेबसाइट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म जो वेब एक्सेसिबिलिटी मानकों के अनुरूप नहीं हैं, उनके नेविगेशन और उपयोग को कठिन बनाते हैं।
      • व्यवसायों की ओर से स्पष्ट और सरल संचार का अभाव, जिससे दिव्यांगजनों के लिये उत्पाद सूचना को समझना और सूचित विकल्प चुनना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वेब एक्सेसिबिलिटी एनुअल रिपोर्ट (2020) के अनुसार, अमेरिका में अवस्थित 98% वेबपेज विधिक दृष्टिकोण से दिव्यांग समुदाय के लिये अभिगम्य नहीं हैं।
  • व्यवहार संबंधी और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ:
    • सामाजिक कलंक, भेदभाव और दिव्यांगजनों की विविध आवश्यकताओं एवं क्षमताओं के बारे में जागरूकता की कमी की स्थिति पाई जाती है। मुख्यधारा के उपभोक्ता अनुभवों से अपवर्जन और उत्पाद एवं सेवा डिज़ाइन में दिव्यांगजनों की प्राथमिकताओं एवं आवश्यकताओं पर सीमित विचार करने की स्थिति भी देखी जाती है। दिव्यांगजनों की क्रय शक्ति और बाज़ार क्षमता के बारे में गलत धारणाएँ मौजूद हैं, जिससे वे वंचना के शिकार होते हैं।
      • NCPEDP (National Centre for Promotion of Employment for Disabled People) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 73% दिव्यांगजनों को सार्वजनिक स्थानों और सुविधाओं तक पहुँच में बाधाओं का सामना करना पड़ा।
  • आर्थिक और वित्तीय बाधाएँ:
    • विशेष सहायक उपकरणों, स्वास्थ्य देखभाल और व्यक्तिगत सहायता सेवाओं की आवश्यकता के कारण दिव्यांगजनों के लिये जीवनयापन की उच्च लागत पाई जाती है। पर्याप्त वित्तीय संसाधनों, रोज़गार के अवसरों और सामाजिक सुरक्षा उपायों तक सीमित पहुँच उनकी उपभोक्ता क्रय शक्ति को बाधित करती है।
      • श्रवण दिव्यांग उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग के कारण श्रवण यंत्रों का वैश्विक बाज़ार वर्ष 2020 में 7.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2027 तक 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।

 

  • नीतिगत और नियामक बाधाएँ:
    • उपभोक्ताओं के रूप में दिव्यांगजनों के लिये अभिगम्यता मानकों और भेदभाव-विरोधी कानूनों के अप्रभावी कार्यान्वयन एवं प्रवर्तन की स्थिति पाई जाती है। समावेशी डिज़ाइन और अभिगम्यता सुविधाओं में निवेश हेतु व्यवसायों के लिये अपर्याप्त प्रोत्साहन एवं समर्थन तंत्र मौजूद है। दिव्यांगजनों के समक्ष विद्यमान बहुमुखी चुनौतियों से निपटने के लिये विभिन्न सरकारी एजेंसियों और हितधारकों के बीच खंडित एवं असंगठित प्रयास ही देखे गए हैं।
      • विकासशील देशों में कार्यशील आयु के 80% से 90% दिव्यांगजन बेरोज़गार हैं, जबकि औद्योगिक देशों में यह आँकड़ा 50% से 70% के बीच है।

दिव्यांगजनों के समक्ष विद्यमान चुनौतियों पर वास्तविक जीवन का एक उदाहरण:

  • कल्पना कीजिए कि आप एक दृष्टिबाधित व्यक्ति हैं जो एक टोस्टर खरीदने के लिये सुपरमार्केट जा रहे हैं:
    • आप एक मोबाइल ऐप के माध्यम से कैब की बुकिंग करना चाहते हैं, लेकिन चूँकि ऐप दिव्यांगजन हेतु सुगम्य नहीं है, इसलिये आप बुकिंग के लिये बाहरी मदद पर निर्भर होते हैं।
    • सुपरमार्केट में, चूँकि इमारत में स्पर्शनीय फुटपाथ (tactile pavements) मौजूद नहीं हैं, इसलिये इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अनुभाग तक पहुँचने और टोस्टर खरीदने के लिये फिर आपको बाहरी मदद की आवश्यकता पड़ती है।
    • आप घर लौटते हैं और पाते हैं कि टोस्टर काम नहीं कर रहा है और आप टोस्टर कंपनी के ग्राहक सहायता से संपर्क करना चाहते हैं।
      • लेकिन चूँकि उनका संपर्क विवरण बाहरी पैक पर मुद्रित होता है, इसलिये उन्हें पढ़ने के लिये आपको फिर बाहरी मदद की आवश्यकता पड़ती है।
    • यह पता चलने पर कि कंपनी केवल डाक के माध्यम से लिखित शिकायतें स्वीकार करती है, एक बार फिर आपको कंपनी को शिकायत भेजने के लिये बाहरी मदद की ज़रूरत पड़ती है।

CwD की चुनौतियों को कम करने के विभिन्न उपाय:

  • व्यवसाय क्षेत्र से शुरुआत करना:
    • व्यवसाय एक प्रारंभिक बिंदु हो सकता है। व्यवसाय आम तौर पर दिव्यांगजनों को अपने लक्षित उपभोक्ता के रूप में नहीं देखते हैं। इसकी पुष्टि उनकी दुर्गम्य पेशकशों से होती है, जो आम तौर पर ‘मुख्यधारा’ के उपभोक्ताओं के लिये डिज़ाइन की गई हैं। विश्व बैंक की वर्ष 2009 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दिव्यांगजनों की संख्या कुल आबादी की 5-8% है। इसलिये, यदि उदारता के कारण नहीं तो कम से कम ग्राहकों तक पहुँच बढ़ाने के लिये व्यवसायों को अपनी पेशकशों को सुगम्य बनाने पर विचार करना चाहिये।
  • व्यवसायों के बीच संवेदनशीलता के अंतराल को दूर करना:
    • प्रभावी नीतिगत उपायों के माध्यम से व्यवसायों के बीच संवेदनशीलता के अंतराल को दूर किया जा सकता है। उदाहरण के लिये, FSSAI ने अक्टूबर 2023 में सभी खाद्य उत्पादों पर उत्पाद सूचना वाले QR कोड को शामिल करने के लिये सभी खाद्य व्यवसाय ऑपरेटरों के लिये एक एडवाइज़री जारी किया। यह सरल लेकिन प्रभावी कदम दृष्टिबाधित लोगों को अपने दम पर महत्त्वपूर्ण उत्पाद सूचना तक पहुँच की अनुमति देगा।
  • सरकार की ओर से सक्रिय सहयोग:
    • सरकार एक अन्य इकाई है जो बदलाव ला सकती है। सरकार सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के लिये व्यापक पहुँच दिशानिर्देश लाने पर विचार कर सकती है। भारत ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों द्वारा की गई पहलों से प्रेरणा लेते हुए अपनी नीतियों में सदृश रणनीतियों को एकीकृत कर सकता है।
  • दिव्यांगता आयोगों का सशक्तीकरण:
    • दिव्यांगजनों को ऐसे कानूनों द्वारा भी सशक्त बनाया जा सकता है जो उपभोक्ताओं के रूप में उनके अधिकारों एवं हितों की रक्षा करते हैं। इस संबंध में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWDA), 2016 एक प्रमुख अधिनियम है।
    • इस अधिनियम में विशेष रूप से सार्वभौमिक रूप से डिज़ाइन की गई उपभोक्ता वस्तुओं एवं सुगम्य सेवाओं (धारा 43 और 46) के प्रावधान शामिल हैं। RPWDA के तहत अधिसूचित नियमों के अनुसार सभी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) वस्तुओं और सेवाओं का BIS मानकों के अनुसार सुगम्य होना आवश्यक है।
    • इन अधिकारों के उल्लंघन के मामले में दिव्यांगजन उपभोक्ता अधिनियम के तहत स्थापित दिव्यांगता आयोगों के पास शिकायत दर्ज कर सकते हैं। हालाँकि दिव्यांगता आयोग केवल अनुशंसात्मक निर्देश जारी करते हैं, इसलिये वे प्रायः पर्याप्त उपचार प्रदान नहीं कर पाते। इसलिये, दंडात्मक उपायों को लागू करने के लिये आयोग को सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 को RPWDA के साथ संरेखित करना:
    • एक अन्य साधन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (CPA), 2019 है जो न केवल विभिन्न उपभोक्ता अधिकारों का विवरण प्रदान करता है बल्कि उपभोक्ता आयोगों को उपभोक्ता शिकायतों के मामले में जुर्माना लगाने और मुआवजा दिलाने का अधिकार भी देता है। उपभोक्ता आयोगों के समक्ष लाए गए कई मामलों में दिव्यांग उपभोक्ताओं ने सफलतापूर्वक ऐसे उपचार प्राप्त किये हैं।
      • उदाहरण के लिये, एस. सुरेश बनाम मैनेजर आई/सी गोकुलम सिनेमा मामले में चलन दिव्यांगता (locomotor disability) रखने वाले एक व्यक्ति को सिनेमा हॉल में दुर्गम्यता का सामना करने के लिये 1 लाख रुपए का मुआवजा प्राप्त हुआ।
    • RPWDA के विपरीत CPA के पास सुदृढ़ प्रवर्तन एवं अनुपालन तंत्र मौजूद है। हालाँकि, इसमें दिव्यांग उपभोक्ताओं के लिये किसी भी समर्पित अधिकार का अभाव है, जो उन्हें उपभोक्ता आयोगों में शिकायत दर्ज करने से अवरुद्ध कर सकता है। इसलिये, CPA को RPWDA के साथ संरेखित करना अनिवार्य हो जाता है।
  • दिव्यांग उपभोक्ताओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए जागरूकता बढ़ाना:
    • दो मुख्य विधानों के तहत दिव्यांग उपभोक्ताओं के लिये उपलब्ध मौजूदा अधिकारों और संसाधनों के बारे में जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। जबकि उपभोक्ता जागरूकता पर राज्य का फोकस रहा है (विशेष रूप से ‘जागो ग्राहक जागो’ जैसे प्रमुख अभियान के साथ), दिव्यांग उपभोक्ताओं पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।

उपभोक्ता संरक्षण के लिये प्रमुख पहलें

निष्कर्ष:

दिव्यांग उपभोक्ताओं के अधिकारों को सुनिश्चित करना न केवल एक कानूनी दायित्व है बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता भी है। समाज अभिगम्यता, गैर-भेदभाव और समान व्यवहार को बढ़ावा देकर सभी के लिये अधिक समावेशी एवं समतामूलक बाज़ार का निर्माण कर सकते हैं। व्यवसायों और सरकारों के लिये यह आवश्यक है कि वे दिव्यांग उपभोक्ताओं के समक्ष विद्यमान विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करने के लिये मिलकर कार्य करें तथा यह सुनिश्चित करें कि वे अर्थव्यवस्था और समाज में पूरी तरह से भागीदारी कर सकें। केवल ठोस प्रयासों और समावेशिता के प्रति प्रतिबद्धता के माध्यम से ही हम एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर सकते हैं जहाँ प्रत्येक उपभोक्ता के साथ, उनकी क्षमताओं की परवाह किये बिना, गरिमा एवं सम्मान के साथ व्यवहार किया जाएगा।

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