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जल प्रबंधन: अभाव से स्थायित्व तक

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भारत गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है जहाँ देश के वृहत भूभागों में जल की भारी कमी की स्थिति उत्पन्न हुई है। ग्रीष्म लहर के लगातार बढ़ते खतरे और वर्षा की अनियमितता ने इस संकट को और बढ़ा दिया है, जहाँ नदियों और जलभृत के जल स्तर चिंताजनक दर से कम हो रहे हैं।

नदियों में जल का प्रवाह कम होने और भूजल स्तर में गिरावट ने इस ग्रीष्मकाल को अत्यंत कठिन बना दिया है। बेंगलुरु जैसे शहरों में नलके सूख गए हैं, जिससे नदी के जल के बँटवारे को लेकर राज्यों के बीच विवाद बढ़ रहा है। इस संकट से निपटने के लिये महज नल जल कनेक्शन प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं है। भारत को संसाधनों के संरक्षण, उचित वितरण और संवहनीय जल प्रबंधन के लिये समग्र रणनीति अपनाने पर केंद्रित एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है।

भारत में जल प्रबंधन की संरचना 

  • केंद्रीय स्तर पर:
    • जल शक्ति मंत्रालय (MoJS): मई 2019 में स्थापित यह नया मंत्रालय राष्ट्रीय जल नीतियों का निर्माण करने और देश भर में जल संसाधन प्रबंधन गतिविधियों की देखरेख करने के लिये उत्तरदायी शीर्ष निकाय है।
    • केंद्रीय जल आयोग (CWC): यह जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत एक तकनीकी संगठन है जो जल संसाधन विकास परियोजनाओं और नदी बेसिन योजना पर तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB): यह भारत में भूजल संसाधनों के आकलन, निगरानी और प्रबंधन के लिये ज़िम्मेदार संस्था है।
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): जैसा कि वर्ष 1974 के जल अधिनियम में परिभाषित किया गया है, CPCB का मुख्य कार्य जल प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने के माध्यम से राज्यों में नदियों एवं कुओं की सफाई को बढ़ावा देना है।
  • राज्य स्तर पर:
    • राज्य जल संसाधन विभाग: ये अपने-अपने राज्यों में जल नीतियों के कार्यान्वयन और जल संसाधनों के प्रबंधन के लिये ज़िम्मेदार हैं।
    • सिंचाई विभाग: ये सिंचाई प्रणालियों के प्रबंधन और कृषि प्रयोजनों के लिये जल वितरण सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
    • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs): ये जल प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण के लिये ज़िम्मेदार हैं।
  • स्थानीय स्तर पर:
    • पंचायत (ग्राम परिषद): पंचायतें जल संरक्षण को बढ़ावा देने और समान वितरण सुनिश्चित करने के साथ ग्राम स्तर पर जल संसाधनों के प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
    • नगरपालिकाएँ: ये शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति और स्वच्छता के प्रबंधन के लिये ज़िम्मेदार हैं।
    • जल उपयोगकर्ता संघ (WUAs): ये स्थानीय स्तर पर सिंचाई प्रणालियों के प्रबंधन और रखरखाव के लिये गठित किसानों के समूह हैं।

जल से संबंधित संवैधानिक प्रावधान 

  • मूल अधिकार: जल, जो मानव अस्तित्व के लिये आवश्यक है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में शामिल है।
  • संघ सूची की प्रविष्टि 56: केंद्र सरकार को अंतर्राज्यीय नदियों और नदी बेसिनों को विनियमित करने एवं विकसित करने के लिये अधिकृत किया गया है, जैसा कि संसद द्वारा सार्वजनिक हित के लिये आवश्यक समझा जाए।
  • राज्य सूची की प्रविष्टि 17: यह प्रविष्टि जल आपूर्ति, सिंचाई, नहर, जल निकासी, तटबंध, जल भंडारण और जल शक्ति से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 262: जल-संबंधी विवादों के मामलों में, संसद अंतर्राज्यीय नदियों या नदी बेसिनों के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिये कानून बना सकती है।
    • इसके अतिरिक्त, संसद ऐसे विवादों को सर्वोच्च न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने के लिये कानून बना सकती है।

भारत में जल संकट के प्रमुख कारण 

  • तेज़ी से घटते भूजल संसाधन: विश्व बैंक के अनुसार, भारत वैश्विक स्तर पर भूजल का सबसे बड़ा निष्कर्षणकर्ता है, जो विश्व के भूजल निष्कर्षण में लगभग 25% हिस्सेदारी रखता है।
    • जल की अत्यधिक निकासी के कारण जलभृतों के जल स्तर में चिंताजनक रूप से कमी आई है।
  • कृषि क्षेत्र की ओर से जल की बढ़ती मांग: भारत में मीठे जल (virtual water) के उपयोग में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 78% है।
    • हरित क्रांति (Green Revolution) के कारण सिंचाई के लिये भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ, जिसके कारण पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल स्तर में भारी गिरावट आई।
    • बाढ़ सिंचाई (Flood irrigation), जो एक अत्यधिक अकुशल विधि है, अभी भी व्यापक रूप से प्रचलित है, जिसके कारण जल की गंभीर हानि होती है।
    • नीति आयोग (NITI Aayog) के अनुसार, गेहूँ की खेती के अंतर्गत शामिल लगभग 74% क्षेत्र और चावल की खेती के अंतर्गत शामिल लगभग 65% क्षेत्र भारी जल संकट का सामना कर रहे हैं।
  • अपर्याप्त जल अवसंरचना: भारत की जल अवसंरचना पुरानी पड़ चुकी प्रणालियों, खराब रखरखाव और रिसाव एवं चोरी के कारण होने वाले भारी नुकसान से ग्रस्त है।
    • मुंबई में रिसाव के कारण प्रतिदिन लगभग 700 मिलियन लीटर जल बर्बाद हो जाता है।
    • नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर साल लगभग 2 लाख लोग अपर्याप्त जल आपूर्ति के कारण मृत्यु का शिकार होते हैं।
  • शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास: तीव्र शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने जल की मांग में वृद्धि की है, साथ ही जल प्रदूषण में भी योगदान किया है।
    • नीति आयोग के अनुसार, जल संकट से जूझ रहे विश्व के 20 सबसे बड़े शहरों में से 5 भारत में हैं और भारत के लगभग 70% सतही जल संसाधन प्रदूषित हैं।
  • रेत खनन: नदी तल से अनियंत्रित रेत खनन (Sand Mining) से नदी की पारिस्थितिकी बाधित होती है और उनकी जल वहन क्षमता कम हो जाती है।
    • इससे न केवल निचले इलाकों में जल उपलब्धता प्रभावित होती है, बल्कि ‘फ्लैश फ्लड’ और नदी तट के कटाव का खतरा भी बढ़ जाता है।
    • यमुना नदी में अनियंत्रित रेत खनन इसका एक उदाहरण है।
  • विखंडित शासन: भारत में जल प्रबंधन प्रायः केंद्रीय और राज्य स्तर पर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच विखंडित बना रहा है।
    • समन्वय की कमी के कारण प्रयासों के दोहराव, संसाधनों के अकुशल आवंटन और परस्पर विरोधी नीतियों की स्थिति बनती है।
    • कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों के बीच जारी कावेरी जल विवाद ऐसे ही विखंडन का परिणाम है।
  • मांग-पक्ष प्रबंधन पर अपर्याप्त ध्यान: भारत की जल नीतियों ने मुख्य रूप से बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है, जबकि मांग-पक्ष प्रबंधन की उपेक्षा की है।
    • जल-कुशल प्रौद्योगिकियों और पुनर्चक्रण जैसे उपायों पर सीमित ध्यान दिया गया है।
    • भारत में केवल 30% अपशिष्ट जल का ही पुनर्चक्रण किया जाता है, जबकि इज़राइल में यह 89-90% तक संपन्न होता है।
  • समुद्र स्तर में वृद्धि और लवणीकरण: जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र स्तर में वृद्धि से तटीय जलभृतों में खारे जल के प्रवेश का खतरा बढ़ता जा रहा है।
    • यह लवणीकरण मीठे जल के स्रोतों को कृषि एवं पेयजल के लिये अनुपयोगी बना देता है, जिससे तटीय समुदायों के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
    • गुजरात और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भूजल की बढ़ती लवणता एक चिंताजनक प्रवृत्ति है।

जल संकट के संभावित परिणाम:

  • मानव पूंजी विकास में बाधा: जल संग्रहण का समय बोझ, विशेषकर बालिकाओं के लिये, प्रायः उन्हें स्कूल छोड़ने के लिये विवश करता है, जिससे उनकी शिक्षा और दीर्घकालिक अवसरों में बाधा उत्पन्न होती है।
    • इसके अलावा, जल की कमी से प्रेरित जलजनित बीमारियों और कुपोषण से बच्चों में संज्ञानात्मक हानि उत्पन्न हो सकती है।
  • दीर्घकालिक आर्थिक जोखिम: विश्व बैंक का अनुमान है कि यदि जल की कमी की समस्या को संबोधित नहीं किया गया तो वर्ष 2050 तक भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद के 6% तक की हानि हो सकती है। इससे आर्थिक वृद्धि और विकास में व्यापक बाधा उत्पन्न हो सकती है।
    • जल की कमी के कारण विभिन्न कारोबार जल-प्रधान उद्योगों में निवेश करने से संकोच कर सकते हैं, जिससे रोज़गार सृजन और आर्थिक अवसर प्रभावित होंगे।
  • जल माफिया का उदय: बेंगलुरु जैसे जल-संकटग्रस्त शहरों में अनौपचारिक जल बाज़ार उभर आए हैं, जहाँ ‘जल माफिया’ जल के टैंकरों तक पहुँच को नियंत्रित करते हैं और भारी कीमत वसूलते हैं।
    • इससे सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं तथा जल जैसी बुनियादी आवश्यकता के लिये एक काला बाज़ार उत्पन्न होता है।
  • सीमापारीय जल विवादों पर प्रभाव: जल की कमी भारत और उसके पड़ोसी देशों (जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश, जो भारत के साथ नदी बेसिनों की साझेदारी करते हैं) के बीच मौजूदा तनावों को और बढ़ा सकती है।
    • इससे क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा हो सकती है और जल संसाधनों को लेकर संघर्ष बढ़ सकता है।
  • जैवविविधता के लिये खतरा: घटते जल स्तर और प्रदूषण से मीठे जल की मछलियों, उभयचरों एवं सरीसृपों के अस्तित्व के लिये खतरा उत्पन्न हो रहा है।
    • गंगा नदी के प्रवाह में कमी के कारण लुप्तप्राय ‘गंगा नदी डॉल्फिन’ अपने पर्यावास के नष्ट होने का खतरा झेल रहे हैं।

भारत में जल संकट से निपटने के लिये सरकार की प्रमुख पहलें

  • राष्ट्रीय जल नीति, 2012
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
  • जल शक्ति अभियान – ‘कैच द रेन’ अभियान
  • अटल भूजल योजना
  • जल जीवन मिशन (JJM)
  • राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG)

जल संकट के समाधान हेतु आवश्यक उपाय:

  • बंजर भूमि को पुनर्भरण इकाइयों में बदलना: कम उपयोग की गई भूमि को रणनीतिक रूप से डिज़ाइन किये गए ‘वाटर पार्कों’ में परिवर्तित किया जाए, जो भूजल पुनर्भरण के लिये समर्पित हों।
    • इन पार्कों में बायोस्वाल (bioswales), निर्मित आर्द्रभूमि और वर्षा जल संचयन संरचनाएँ शामिल की जा सकती हैं, जिससे ऐसे आकर्षक स्थान निर्मित होंगे जो सक्रिय रूप से जलभृतों की पूर्ति करेंगे।
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों और अपशिष्ट के उपयोग से विलवणीकरण: बड़े पैमाने के विलवणीकरण संयंत्रों का विकास किया जाए जो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों और अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकी के संयोजन द्वारा संचालित हों।
    • विलवणीकरण संयंत्र न केवल स्वच्छ जल उत्पन्न करते हैं, बल्कि अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन में परिवर्तित भी करते हैं, जिससे एक संवहनीय एवं आत्मनिर्भर जल उत्पादन प्रणाली का निर्माण होता है।
  • शहरी वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ: सभी नए भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणालियों की स्थापना को अनिवार्य बनाया जाए तथा मौजूदा संरचनाओं का नवीनीकरण किया जाए।
    • ‘ग्रीन रूफ’ (green roofs) को भी अपनाया जा सकता है जो वर्षा जल को रोककर रखती हैं, भूजल का पुनःभरण करती हैं और झंझा-नीर (stormwater) के अपवाह को कम करती हैं।
    • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में संवहनीय सार्वजनिक परिवहन विकल्पों को बढ़ावा देने के लिये रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम में 900 वर्षा जल संचयन गड्ढे स्थापित किये जाने हैं।
  • ड्रिप सिंचाई और ‘एक्वापोनिक्स’ को बढ़ावा देना: ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के व्यापक अंगीकरण को प्रोत्साहित किया जाए जो पौधों की जड़ों तक प्रत्यक्ष रूप से जल पहुँचाते हैं और वाष्पीकरण से होने वाली जल हानि को न्यूनतम करते हैं।
    • इसके साथ ही, एक्वापोनिक्स फार्मों (aquaponics farms) के विकास का समर्थन किया जाए, जो एक क्लोज्ड-लूप प्रणाली में एक्वाकल्चर (मछली पालन) को हाइड्रोपोनिक्स (जल में पौधे उगाना) के साथ संयुक्त करते हैं, जिससे जल की खपत घटती है।
  • स्मार्ट वाटर ग्रिड: स्मार्ट वाटर ग्रिड का विकास किया जाए जो संपूर्ण जल वितरण नेटवर्क में सेंसर और त्वरित निगरानी प्रणालियों को एकीकृत करते हैं।
    • इससे रिसाव का शीघ्र पता लगाने, इष्टतम दबाव का प्रबंधन करने और समग्र दक्षता में सुधार लाने में मदद मिलती है।
  • कोहरा संग्रहण (Fog Harvesting): पहाड़ी क्षेत्रों में कोहरा संग्रहण प्रौद्योगिकियों की संभावनाओं का पता लगाया जाए। इसके तहत विशेष जालीदार संरचनाएँ कोहरे से जल की बूँदों को जब्त करती हैं, जिससे सीमित वर्षा वाले क्षेत्रों में जल का एक मूल्यवान स्रोत उपलब्ध हो जाता है।
    • चिली, मोरक्को और पेरू जैसे देशों में क्रियान्वित सफल कोहरा संग्रहण परियोजनाओं से भारत भी प्रेरणा ग्रहण कर सकता है।
  • विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन: ग्रामीण जल आपूर्ति एवं स्वच्छता के लिये विकेंद्रीकृत और समुदाय-संचालित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जैसा कि उत्तराखंड राज्य की स्वजल परियोजना में परिलक्षित होता है।
    • इसके अलावा, समुदाय या भवन स्तर पर विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाए।
    • ये सुसंहत प्रणालियाँ अपशिष्ट जल को गैर-पेय अनुप्रयोगों में पुनः उपयोग के लिये उपचारित करती हैं, जिससे केंद्रीकृत उपचार संयंत्रों पर बोझ कम हो जाता है और मीठे जल की बचत होती है।
  • जल अवसंरचना के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी: जल अवसंरचना परियोजनाओं के विकास एवं रखरखाव के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को प्रोत्साहित किया जाए।
    • इससे जल अवसंरचना विकास में व्याप्त अंतराल को दूर करने के लिये निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और वित्तपोषण का लाभ उठाया जा सकता है।
  • उद्योगों के लिये शून्य तरल निर्वहन: जल-गहन उद्योगों के लिये शून्य तरल निर्वहन (Zero Liquid Discharge- ZLD) प्रणाली के अंगीकरण को अनिवार्य बनाया जाए, जिसके तहत अपशिष्ट जल को उपचारित किया जाता है और पुनःउपयोग के लिये पुनर्चक्रित किया जाता है।
    • इको-इंडस्ट्रियल पार्कों के विकास को प्रोत्साहित किया जाए, जहाँ उद्योग जल संसाधनों की साझेदारी और पुनःउपयोग कर सकते हैं तथा जिससे मीठे जल की मांग और प्रदूषण में कमी लाने में योगदान दे सकते हैं।

 

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