Current Affairs For India & Rajasthan | Notes for Govt Job Exams

कार्बन फार्मिंग: सतत् कृषि का मार्ग

FavoriteLoadingAdd to favorites

बढ़ती पर्यावरणीय चिंताओं और जलवायु-प्रत्यास्थी कृषि प्रणालियों की तत्काल आवश्यकता के आलोक में कार्बन फार्मिंग (Carbon Farming) का उभार वैश्विक स्तर पर कृषि क्षेत्र के भीतर एक महत्त्वपूर्ण तंत्र के रूप में हुआ है।

सभी जीवित प्राणियों और विभिन्न खनिजों में पाया जाने वाला कार्बन पृथ्वी पर जीवन की आधारशिला के रूप में कार्य करता है, जो प्रकाश संश्लेषण एवं श्वसन जैसी विभिन्न प्रक्रियाओं पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है।

खेती की प्रक्रिया में भूमि की देखभाल करना, फसलें उगाना और खाद्य के लिये पशुपालन करना शामिल है।

कार्बन फार्मिंग:

  • परिचय:
    • कार्बन फार्मिंग एक रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है जिसका उद्देश्य कार्बन पृथक्करण (carbon sequestration) को अधिकतम करना और ऐसे कृषि अभ्यासों का नियोजन करना है जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के अवशोषण को बढ़ाए तथा पादप बायोमास एवं मृदा के कार्बनिक पदार्थ में इसके अवधारण को सुगम बनाए।
    • इस प्रक्रिया को सावधानीपूर्ण योजना-निर्माण, निगरानी और स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन की आवश्यकता होगी ताकि जलवायु परिवर्तन के शमन में इसकी प्रभावशीलता को अधिकतम किया जा सके।

 

कार्बन फार्मिंग का महत्त्व:

  • जलवायु परिवर्तन का शमन: मृदा में कार्बन के पृथकक्करण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर नियंत्रण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष में कार्बन फार्मिंग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • मृदा स्वास्थ्य संवर्द्धन: कार्बन फार्मिंग स्वस्थ मृदा का पोषण कर इसके जल प्रतिधारण को बढ़ाती है, अपरदन को कम करती है और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाती है, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार एवं कृषि उत्पादकता में वृद्धि होती है।
    • जैविक कचरे को खाद या कंपोस्ट में परिवर्तित करना, जिसका उपयोग मृदा संरचना, उर्वरता और कार्बन सामग्री में सुधार के लिये मृदा संशोधन के रूप में किया जा सकता है।
  • जैव विविधता संवर्द्धन: कार्बन फार्मिंग कृषि व्यवस्था में जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देकर जैव विविधता को बढ़ाती है जहाँ लाभकारी कीट एवं परागणक आकर्षित होते हैं। इससे फसल का स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है।
  • आर्थिक अवसर: कार्बन कृषि अभ्यासों के कार्यान्वयन से किसानों के लिये कार्बन क्रेडिट बाज़ार में प्रवेश के रास्ते खुलते हैं, साथ ही समृद्ध मृदा से अधिक पैदावार प्राप्त होती है, जिससे उनके आय के स्रोतों में विविधता आती है एवं वित्तीय प्रत्यास्थता बढ़ती है।

कार्बन फार्मिंग में शामिल तकनीकें:

  • वन प्रबंधन
    • स्वस्थ वन अन्य स्रोतों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का अवशोषण एवं अवधारण करते हैं और ये ग्रीनहाउस गैस (GHG) पृथक्करण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। विभिन्न प्रकार की रणनीतियों के माध्यम से कार्बन ऑफसेट (Carbon offsets) का सृजन किया जा सकता है। इन रणनीतियों में निर्वनीकरण पर रोक एवं स्थायी भूमि संरक्षण, पुनर्वनीकरण एवं पुनर्रोपण गतिविधियाँ और बेहतर वन प्रबंधन शामिल हैं।
    • कृषि वानिकी (Agroforestry) न केवल कार्बन पृथक्करण में योगदान देती है बल्कि किसानों के लिये आय के अतिरिक्त स्रोत भी प्रदान करती है।
    • वनों की कटाई वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस स्तर में 15-20% की वृद्धि करती है। इसे संबोधित करने संबंधी कार्रवाइयों में फ़ॉरेस्ट थिनिंग (forests thinning) के साथ उनका प्रबंधन करना, वृक्षों की चुनिंदा तरीके से कटाई करना, पुनः वृद्धि प्रोत्साहित करना, नए पेड़ लगाना और उर्वरकों का उपयोग करना शामिल है ताकि वन उत्पादक एवं संवहनीय तरीके से विकसित हो सकें।
  • घासभूमियों का संरक्षण
    • देशी घास और अन्य वनस्पतियाँ ग्रीनहाउस गैस अवशोषण एवं पृथक्करण की प्राकृतिक स्रोत हैं।
    • इस श्रेणी से सृजित कार्बन ऑफसेट स्थायी भूमि संरक्षण के माध्यम से देशी पादप जीवन को बनाए रखने और वाणिज्यिक विकास या गहन कृषि के लिये भूमि रूपांतरण से बचने पर केंद्रित है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन
    • पवन या सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा केंद्र विद्युत ग्रिड के भीतर जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन स्रोतों को विस्थापित कर कार्बन ऑफसेट का सृजन करते हैं।
    • एक प्रमाणित थर्ड-पार्टी परियोजना से प्राप्त कार्बन ऑफसेट से कार्बन क्रेडिट (carbon credit) का सृजन होता है, जिसका स्वामित्व परियोजना को विकसित करने वाली इकाई के पास होता है।
  • संरक्षण कृषि तकनीक
    • शून्य जुताई (zero tillage), फसल चक्र, कवर क्रॉपिंग (cover cropping) और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी विधियाँ कार्बनिक पदार्थ संचय को बढ़ावा देते हुए मृदा व्यवधान को न्यूनतम करती हैं।
    • मृदा के संरक्षण एवं संवर्द्धन, जैव विविधता की वृद्धि और कार्बन पृथक्करण के लिये परती अवधि के दौरान कवर क्रॉपिंग करना एक उपयुक्त उपाय है।
  • आवर्ती चराई (Rotational Grazing)
    • इसमें पशुधन को समय-समय पर नए चरागाहों में स्थानांतरित करना शामिल है। यह अभ्यास चराई किये जा चुके क्षेत्रों को पुनः जीवंत करने, मृदा अपरदन को कम करने और सुदृढ़ पुनः वृद्धि को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करता है।
    • बदले में, वृद्धि करती वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण एवं मृदा में इसके पृथक्करण में योगदान देती हैं।

 

कार्बन पृथक्करण में मैंग्रोव की भूमिका:

  • कार्बन भंडारण:
    • मैंग्रोव (Mangrove) भूमि के ऊपर के अपने बायोमास, भूमि के नीचे की जड़ों और कार्बनिक-समृद्ध तलछट में बड़ी मात्रा में कार्बन का भंडारण करते हैं।
    • मैंग्रोव मृदा में सघन वनस्पति और कार्बनिक पदार्थों की धीमी अपघटन दर के परिणामस्वरूप समय के साथ पर्याप्त कार्बन संचय होता है।
  • ब्लू कार्बन पारितंत्र (Blue Carbon Ecosystem):
    • मैंग्रोव ब्लू कार्बन पारितंत्र के अंग हैं। ब्लू कार्बन पारितंत्र मैंग्रोव, समुद्री घास और लवण दलदल जैसे तटीय एवं समुद्री पर्यावासों में संग्रहित कार्बन को संदर्भित करता है।
    • मैंग्रोव पृथ्वी की सतह के 0.1% से भी कम हिस्से को कवर करते हैं, लेकिन अन्य पारितंत्रों की तुलना में कार्बन की उच्च मात्रा के पृथक्करण एवं संग्रहण में योगदान करते हैं।

भारत में कार्बन फार्मिंग के लिये संभावित अवसर 

  • आर्थिक अवसर: भारत का व्यापक कृषि आधार कार्बन कृषि अभ्यासों के अंगीकरण के माध्यम से महत्त्वपूर्ण आर्थिक अवसर प्रस्तुत करता है, जिसकी अनुमानित क्षमता लगभग 170 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि से 63 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक है।
  • कार्बन क्रेडिट प्रणालियाँ: कार्बन क्रेडिट प्रणालियों के कार्यान्वयन से भारतीय किसानों को पर्यावरणीय सेवाओं में उनके योगदान को चिह्नित करते हुए अतिरिक्त आय के स्रोत उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
    • भारत की कृषि भूमियों में 20-30 वर्षों की अवधि में प्रतिवर्ष 3-8 बिलियन टन CO2 समतुल्य के पृथक्करण की क्षमता है, जिससे किसानों को कार्बन ट्रेडिंग बाज़ारों में भाग लेने के अवसर मिलेंगे।
  • क्षेत्रीय उपयुक्तता: भारत के विभिन्न क्षेत्र कार्बन फार्मिंग संबंधी पहलों के लिये अलग-अलग स्तर की उपयुक्तता या अनुकूलता प्रदान करते हैं।
    • सिंधु-गंगा क्षेत्र के उपजाऊ मैदान और विशाल दक्कन पठार कार्बन फार्मिंग अभ्यासों को लागू करने के लिये विशेष रूप से अनुकूल हैं।
    • हालाँकि, हिमालय की तलहटी और तटीय क्षेत्रों जैसे भूभागों को पर्वतीय भूदृश्य और लवणीकरण सहित विभिन्न विशिष्ट चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिये कार्बन फार्मिंग के कार्यान्वयन हेतु अनुरूप दृष्टिकोण की आवश्यकता पड़ सकती है।

वैश्विक कार्बन फार्मिंग सबंधी पहलें

  • कार्बन ट्रेडिंग: संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और कनाडा जैसे कुछ देशों में स्वैच्छिक कार्बन बाज़ारों का उभार हो रहा है।
    • ये मंच किसानों को सत्यापित कार्बन पृथक्करण प्रयासों में संलग्न होकर अतिरिक्त आय अर्जित करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे कार्बन फार्मिंग संबंधी तकनीकों के अंगीकरण को बढ़ावा मिलता है।
  • अन्य वैश्विक प्रयास: ‘4 per 1000’ जैसी पहलें
    • केन्या की कृषि कार्बन परियोजना (विश्व बैंक द्वारा समर्थित) को पेरिस में वर्ष 2015 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP21) में प्रस्तुत किया गया था।
    • ऑस्ट्रेलिया की कार्बन फार्मिंग पहल वैश्विक स्तर पर कार्बन फार्मिंग की वकालत करती है।
  • भारत का कानूनी ढाँचा: भारत सरकार ने वर्ष 2022 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 में एक संशोधन पारित किया, जिसने भारतीय कार्बन बाज़ार की नींव रखी। इसके बाद ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) ने उद्योग क्षेत्र के हितधारकों की चिंताओं एवं दृष्टिकोणों को समझने के लिये एक विमर्श का आयोजन किया।
    • यह विषय संक्षेप में कार्बन बाज़ारों की दो प्रमुख टाइपोलॉजी— परियोजना-आधारित/ऑफ़सेट एवं उत्सर्जन व्यापार योजना (ETS) बाज़ारों को विखंडित करता है और उनकी पर्यावरणीय अखंडता एवं कार्यात्मक सीमाओं को निर्धारित करने वाली उनकी प्रमुख विशेषताओं की रूपरेखा तैयार करता है।

कार्बन फार्मिंग से संबद्ध प्रमुख चुनौतियाँ:

  • मृदा का संघटन: खराब संरचना या निम्न कार्बनिक पदार्थ रखने वाली मृदा में कार्बन भंडारण की सीमित क्षमता हो सकती है और इसकी उर्वरता एवं कार्बन पृथक्करण क्षमता को बढ़ाने के लिये संशोधन या प्रबंधन अभ्यासों की आवश्यकता हो सकती है।
  • भौगोलिक स्थिति: तुंगता, ढलान एवं जल निकायों से निकटता जैसे भौगोलिक कारक भी भूमि उपयोग विकल्पों और कृषि उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
    • उदाहरण के लिये, अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ठंडे तापमान के कारण फसल के सीमित विकल्प हो सकते हैं, जबकि तटीय क्षेत्रों में खारे जल के प्रवेश और मृदा की लवणता से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
  • फसलों की किस्में: विशिष्ट मृदा प्रकारों, जलवायु और फसल मौसमों के लिये उपयुक्त फसल किस्मों का चयन कृषि उत्पादकता एवं कार्बन अवशोषण क्षमता को अनुकूलित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है। ऐसी किस्में जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हों और कीटों, बीमारियों एवं चरम मौसमी घटनाओं के प्रति प्रत्यास्थी हों, फसल की पैदावार को बढ़ा सकती हैं तथा मृदा स्वास्थ्य एवं कार्बन भंडारण में योगदान दे सकती हैं।
    • हालाँकि, विविध फसल किस्मों की सीमित उपलब्धता या उन्नत बीजों तक पहुँच की कमी कार्बन फार्मिंग के लाभ को अधिकतम करने की किसानों की क्षमता को बाधित कर सकती है।
  • जल की कमी: पौधों की वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण (जो कार्बन पृथक्करण के लिये मूलभूत प्रक्रियाएँ हैं) के लिये पर्याप्त जल आवश्यक है।
    • जल की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण शुष्क क्षेत्रों को कार्बन फार्मिंग में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जहाँ जल की कमी से पौधों की वृद्धि बाधित होती है और कार्बन पृथक्करण की क्षमता कम हो जाती है।
  • वित्तीय बाधाएँ: भारत जैसे विकासशील देशों में लघु कृषकों को प्रायः वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो कार्बन फार्मिंग के लिये आवश्यक संवहनीय अभ्यासों को लागू करने से संबद्ध आरंभिक लागतों को वहन करने के लिये संघर्ष करते हैं।
  • सीमित नीतिगत समर्थन: ठोस नीति ढाँचे की अनुपस्थिति और अपर्याप्त सामुदायिक भागीदारी कार्बन फार्मिंग अभ्यासों के व्यापक रूप से अंगीकरण को बाधित करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन शमन पर इसका संभावित प्रभाव कमज़ोर पड़ता है।

कार्बन फार्मिंग को प्रोत्साहित करने के लिये आवश्यक रणनीतियाँ:

  • कार्बन फार्मिंग के लिये कानूनी ढाँचा: व्यापक कार्बन फार्मिंग विधान को लागू करने से कृषि भूमि पर कार्बन सिंक के निर्माण की अवधारणा प्रदर्शित हो सकती है और यह दृष्टिकोण जलवायु संकट को संबोधित कर सकता है, कृषि संवहनीयता में सुधार कर सकता है तथा समतामूलक विकास को बढ़ावा दे सकता है।
  • किसानों के लिये प्रत्यक्ष प्रोत्साहन: कार्बन कैप्चर में कृषि एवं वानिकी क्षेत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को चिह्नित करते हुए, जलवायु-अनुकूल अभ्यासों के अंगीकरण को बढ़ावा देने के लिये साधनों एवं ऋण सहायता के रूप में प्रत्यक्ष प्रोत्साहन प्रदान करना अनिवार्य है। मौजूदा नीतियों में कार्बन सिंक के विस्तार एवं संरक्षण को उल्लेखनीय रूप से प्रोत्साहित करने के लिये लक्षित साधनों का अभाव है।
  • कार्बन क्रेडिट और बैंकों का उपयोग करना: किसानों को वैश्विक रूप से व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट देकर पुरस्कृत करना और कार्बन बैंक स्थापित करना कार्बन पृथक्करण प्रयासों को प्रोत्साहित कर सकता है। ये तंत्र उत्सर्जन ऑफसेट चाहने वाले निगमों को क्रेडिट की बिक्री की सुविधा प्रदान कर सकते हैं और इस प्रकार संवहनीय भूमि प्रबंधन को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • सामूहिक सहभागिता: कार्बन फार्मिंग हेतु एक सफल ढाँचे के लिये सुसंगत नीतियों, सार्वजनिक-निजी सहयोग, परिशुद्ध मात्रा निर्धारण विधियों और सहायक वित्तपोषण तंत्र की आवश्यकता होगी। मृदा स्वास्थ्य एवं प्रत्यास्थता को सुनिश्चित करते हुए मापनीय कार्बन कैप्चर की प्राप्ति के लिये ‘स्केलेबल’ स्तर पर कार्यान्वयन महत्त्वपूर्ण है।
  • मृदा की क्षमता को साकार करना: मृदा (जो जलवायु रक्षा में उपेक्षित रही है) एक प्रभावशाली कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती है। भारत को शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों (Net Zero goals) की प्राप्ति के लिये और ‘डीकार्बोनाइज़ेशन’ को आगे बढ़ाने के लिये अपनी क्षमता का दोहन करना चाहिये।बढ़ती पर्यावरणीय चिंताओं और जलवायु-प्रत्यास्थी कृषि प्रणालियों की तत्काल आवश्यकता के आलोक में कार्बन फार्मिंग (Carbon Farming) का उभार वैश्विक स्तर पर कृषि क्षेत्र के भीतर एक महत्त्वपूर्ण तंत्र के रूप में हुआ है।

    सभी जीवित प्राणियों और विभिन्न खनिजों में पाया जाने वाला कार्बन पृथ्वी पर जीवन की आधारशिला के रूप में कार्य करता है, जो प्रकाश संश्लेषण एवं श्वसन जैसी विभिन्न प्रक्रियाओं पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है।

    खेती की प्रक्रिया में भूमि की देखभाल करना, फसलें उगाना और खाद्य के लिये पशुपालन करना शामिल है।

    कार्बन फार्मिंग:

    • परिचय:
      • कार्बन फार्मिंग एक रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है जिसका उद्देश्य कार्बन पृथक्करण (carbon sequestration) को अधिकतम करना और ऐसे कृषि अभ्यासों का नियोजन करना है जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के अवशोषण को बढ़ाए तथा पादप बायोमास एवं मृदा के कार्बनिक पदार्थ में इसके अवधारण को सुगम बनाए।
      • इस प्रक्रिया को सावधानीपूर्ण योजना-निर्माण, निगरानी और स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन की आवश्यकता होगी ताकि जलवायु परिवर्तन के शमन में इसकी प्रभावशीलता को अधिकतम किया जा सके।

     

    कार्बन फार्मिंग का महत्त्व:

    • जलवायु परिवर्तन का शमन: मृदा में कार्बन के पृथकक्करण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर नियंत्रण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष में कार्बन फार्मिंग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • मृदा स्वास्थ्य संवर्द्धन: कार्बन फार्मिंग स्वस्थ मृदा का पोषण कर इसके जल प्रतिधारण को बढ़ाती है, अपरदन को कम करती है और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाती है, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार एवं कृषि उत्पादकता में वृद्धि होती है।
      • जैविक कचरे को खाद या कंपोस्ट में परिवर्तित करना, जिसका उपयोग मृदा संरचना, उर्वरता और कार्बन सामग्री में सुधार के लिये मृदा संशोधन के रूप में किया जा सकता है।
    • जैव विविधता संवर्द्धन: कार्बन फार्मिंग कृषि व्यवस्था में जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देकर जैव विविधता को बढ़ाती है जहाँ लाभकारी कीट एवं परागणक आकर्षित होते हैं। इससे फसल का स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है।
    • आर्थिक अवसर: कार्बन कृषि अभ्यासों के कार्यान्वयन से किसानों के लिये कार्बन क्रेडिट बाज़ार में प्रवेश के रास्ते खुलते हैं, साथ ही समृद्ध मृदा से अधिक पैदावार प्राप्त होती है, जिससे उनके आय के स्रोतों में विविधता आती है एवं वित्तीय प्रत्यास्थता बढ़ती है।

    कार्बन फार्मिंग में शामिल तकनीकें:

    • वन प्रबंधन
      • स्वस्थ वन अन्य स्रोतों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का अवशोषण एवं अवधारण करते हैं और ये ग्रीनहाउस गैस (GHG) पृथक्करण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। विभिन्न प्रकार की रणनीतियों के माध्यम से कार्बन ऑफसेट (Carbon offsets) का सृजन किया जा सकता है। इन रणनीतियों में निर्वनीकरण पर रोक एवं स्थायी भूमि संरक्षण, पुनर्वनीकरण एवं पुनर्रोपण गतिविधियाँ और बेहतर वन प्रबंधन शामिल हैं।
      • कृषि वानिकी (Agroforestry) न केवल कार्बन पृथक्करण में योगदान देती है बल्कि किसानों के लिये आय के अतिरिक्त स्रोत भी प्रदान करती है।
      • वनों की कटाई वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस स्तर में 15-20% की वृद्धि करती है। इसे संबोधित करने संबंधी कार्रवाइयों में फ़ॉरेस्ट थिनिंग (forests thinning) के साथ उनका प्रबंधन करना, वृक्षों की चुनिंदा तरीके से कटाई करना, पुनः वृद्धि प्रोत्साहित करना, नए पेड़ लगाना और उर्वरकों का उपयोग करना शामिल है ताकि वन उत्पादक एवं संवहनीय तरीके से विकसित हो सकें।
    • घासभूमियों का संरक्षण
      • देशी घास और अन्य वनस्पतियाँ ग्रीनहाउस गैस अवशोषण एवं पृथक्करण की प्राकृतिक स्रोत हैं।
      • इस श्रेणी से सृजित कार्बन ऑफसेट स्थायी भूमि संरक्षण के माध्यम से देशी पादप जीवन को बनाए रखने और वाणिज्यिक विकास या गहन कृषि के लिये भूमि रूपांतरण से बचने पर केंद्रित है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन
      • पवन या सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा केंद्र विद्युत ग्रिड के भीतर जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन स्रोतों को विस्थापित कर कार्बन ऑफसेट का सृजन करते हैं।
      • एक प्रमाणित थर्ड-पार्टी परियोजना से प्राप्त कार्बन ऑफसेट से कार्बन क्रेडिट (carbon credit) का सृजन होता है, जिसका स्वामित्व परियोजना को विकसित करने वाली इकाई के पास होता है।
    • संरक्षण कृषि तकनीक
      • शून्य जुताई (zero tillage), फसल चक्र, कवर क्रॉपिंग (cover cropping) और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी विधियाँ कार्बनिक पदार्थ संचय को बढ़ावा देते हुए मृदा व्यवधान को न्यूनतम करती हैं।
      • मृदा के संरक्षण एवं संवर्द्धन, जैव विविधता की वृद्धि और कार्बन पृथक्करण के लिये परती अवधि के दौरान कवर क्रॉपिंग करना एक उपयुक्त उपाय है।
    • आवर्ती चराई (Rotational Grazing)
      • इसमें पशुधन को समय-समय पर नए चरागाहों में स्थानांतरित करना शामिल है। यह अभ्यास चराई किये जा चुके क्षेत्रों को पुनः जीवंत करने, मृदा अपरदन को कम करने और सुदृढ़ पुनः वृद्धि को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करता है।
      • बदले में, वृद्धि करती वनस्पतियाँ प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण एवं मृदा में इसके पृथक्करण में योगदान देती हैं।

     

    कार्बन पृथक्करण में मैंग्रोव की भूमिका:

    • कार्बन भंडारण:
      • मैंग्रोव (Mangrove) भूमि के ऊपर के अपने बायोमास, भूमि के नीचे की जड़ों और कार्बनिक-समृद्ध तलछट में बड़ी मात्रा में कार्बन का भंडारण करते हैं।
      • मैंग्रोव मृदा में सघन वनस्पति और कार्बनिक पदार्थों की धीमी अपघटन दर के परिणामस्वरूप समय के साथ पर्याप्त कार्बन संचय होता है।
    • ब्लू कार्बन पारितंत्र (Blue Carbon Ecosystem):
      • मैंग्रोव ब्लू कार्बन पारितंत्र के अंग हैं। ब्लू कार्बन पारितंत्र मैंग्रोव, समुद्री घास और लवण दलदल जैसे तटीय एवं समुद्री पर्यावासों में संग्रहित कार्बन को संदर्भित करता है।
      • मैंग्रोव पृथ्वी की सतह के 0.1% से भी कम हिस्से को कवर करते हैं, लेकिन अन्य पारितंत्रों की तुलना में कार्बन की उच्च मात्रा के पृथक्करण एवं संग्रहण में योगदान करते हैं।

    भारत में कार्बन फार्मिंग के लिये संभावित अवसर 

    • आर्थिक अवसर: भारत का व्यापक कृषि आधार कार्बन कृषि अभ्यासों के अंगीकरण के माध्यम से महत्त्वपूर्ण आर्थिक अवसर प्रस्तुत करता है, जिसकी अनुमानित क्षमता लगभग 170 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि से 63 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक है।
    • कार्बन क्रेडिट प्रणालियाँ: कार्बन क्रेडिट प्रणालियों के कार्यान्वयन से भारतीय किसानों को पर्यावरणीय सेवाओं में उनके योगदान को चिह्नित करते हुए अतिरिक्त आय के स्रोत उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
      • भारत की कृषि भूमियों में 20-30 वर्षों की अवधि में प्रतिवर्ष 3-8 बिलियन टन CO2 समतुल्य के पृथक्करण की क्षमता है, जिससे किसानों को कार्बन ट्रेडिंग बाज़ारों में भाग लेने के अवसर मिलेंगे।
    • क्षेत्रीय उपयुक्तता: भारत के विभिन्न क्षेत्र कार्बन फार्मिंग संबंधी पहलों के लिये अलग-अलग स्तर की उपयुक्तता या अनुकूलता प्रदान करते हैं।
      • सिंधु-गंगा क्षेत्र के उपजाऊ मैदान और विशाल दक्कन पठार कार्बन फार्मिंग अभ्यासों को लागू करने के लिये विशेष रूप से अनुकूल हैं।
      • हालाँकि, हिमालय की तलहटी और तटीय क्षेत्रों जैसे भूभागों को पर्वतीय भूदृश्य और लवणीकरण सहित विभिन्न विशिष्ट चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिये कार्बन फार्मिंग के कार्यान्वयन हेतु अनुरूप दृष्टिकोण की आवश्यकता पड़ सकती है।

    वैश्विक कार्बन फार्मिंग सबंधी पहलें

    • कार्बन ट्रेडिंग: संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और कनाडा जैसे कुछ देशों में स्वैच्छिक कार्बन बाज़ारों का उभार हो रहा है।
      • ये मंच किसानों को सत्यापित कार्बन पृथक्करण प्रयासों में संलग्न होकर अतिरिक्त आय अर्जित करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे कार्बन फार्मिंग संबंधी तकनीकों के अंगीकरण को बढ़ावा मिलता है।
    • अन्य वैश्विक प्रयास: ‘4 per 1000’ जैसी पहलें
      • केन्या की कृषि कार्बन परियोजना (विश्व बैंक द्वारा समर्थित) को पेरिस में वर्ष 2015 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP21) में प्रस्तुत किया गया था।
      • ऑस्ट्रेलिया की कार्बन फार्मिंग पहल वैश्विक स्तर पर कार्बन फार्मिंग की वकालत करती है।
    • भारत का कानूनी ढाँचा: भारत सरकार ने वर्ष 2022 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 में एक संशोधन पारित किया, जिसने भारतीय कार्बन बाज़ार की नींव रखी। इसके बाद ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) ने उद्योग क्षेत्र के हितधारकों की चिंताओं एवं दृष्टिकोणों को समझने के लिये एक विमर्श का आयोजन किया।
      • यह विषय संक्षेप में कार्बन बाज़ारों की दो प्रमुख टाइपोलॉजी— परियोजना-आधारित/ऑफ़सेट एवं उत्सर्जन व्यापार योजना (ETS) बाज़ारों को विखंडित करता है और उनकी पर्यावरणीय अखंडता एवं कार्यात्मक सीमाओं को निर्धारित करने वाली उनकी प्रमुख विशेषताओं की रूपरेखा तैयार करता है।

    कार्बन फार्मिंग से संबद्ध प्रमुख चुनौतियाँ:

    • मृदा का संघटन: खराब संरचना या निम्न कार्बनिक पदार्थ रखने वाली मृदा में कार्बन भंडारण की सीमित क्षमता हो सकती है और इसकी उर्वरता एवं कार्बन पृथक्करण क्षमता को बढ़ाने के लिये संशोधन या प्रबंधन अभ्यासों की आवश्यकता हो सकती है।
    • भौगोलिक स्थिति: तुंगता, ढलान एवं जल निकायों से निकटता जैसे भौगोलिक कारक भी भूमि उपयोग विकल्पों और कृषि उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
      • उदाहरण के लिये, अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ठंडे तापमान के कारण फसल के सीमित विकल्प हो सकते हैं, जबकि तटीय क्षेत्रों में खारे जल के प्रवेश और मृदा की लवणता से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
    • फसलों की किस्में: विशिष्ट मृदा प्रकारों, जलवायु और फसल मौसमों के लिये उपयुक्त फसल किस्मों का चयन कृषि उत्पादकता एवं कार्बन अवशोषण क्षमता को अनुकूलित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है। ऐसी किस्में जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हों और कीटों, बीमारियों एवं चरम मौसमी घटनाओं के प्रति प्रत्यास्थी हों, फसल की पैदावार को बढ़ा सकती हैं तथा मृदा स्वास्थ्य एवं कार्बन भंडारण में योगदान दे सकती हैं।
      • हालाँकि, विविध फसल किस्मों की सीमित उपलब्धता या उन्नत बीजों तक पहुँच की कमी कार्बन फार्मिंग के लाभ को अधिकतम करने की किसानों की क्षमता को बाधित कर सकती है।
    • जल की कमी: पौधों की वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण (जो कार्बन पृथक्करण के लिये मूलभूत प्रक्रियाएँ हैं) के लिये पर्याप्त जल आवश्यक है।
      • जल की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण शुष्क क्षेत्रों को कार्बन फार्मिंग में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जहाँ जल की कमी से पौधों की वृद्धि बाधित होती है और कार्बन पृथक्करण की क्षमता कम हो जाती है।
    • वित्तीय बाधाएँ: भारत जैसे विकासशील देशों में लघु कृषकों को प्रायः वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो कार्बन फार्मिंग के लिये आवश्यक संवहनीय अभ्यासों को लागू करने से संबद्ध आरंभिक लागतों को वहन करने के लिये संघर्ष करते हैं।
    • सीमित नीतिगत समर्थन: ठोस नीति ढाँचे की अनुपस्थिति और अपर्याप्त सामुदायिक भागीदारी कार्बन फार्मिंग अभ्यासों के व्यापक रूप से अंगीकरण को बाधित करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन शमन पर इसका संभावित प्रभाव कमज़ोर पड़ता है।

    कार्बन फार्मिंग को प्रोत्साहित करने के लिये आवश्यक रणनीतियाँ:

    • कार्बन फार्मिंग के लिये कानूनी ढाँचा: व्यापक कार्बन फार्मिंग विधान को लागू करने से कृषि भूमि पर कार्बन सिंक के निर्माण की अवधारणा प्रदर्शित हो सकती है और यह दृष्टिकोण जलवायु संकट को संबोधित कर सकता है, कृषि संवहनीयता में सुधार कर सकता है तथा समतामूलक विकास को बढ़ावा दे सकता है।
    • किसानों के लिये प्रत्यक्ष प्रोत्साहन: कार्बन कैप्चर में कृषि एवं वानिकी क्षेत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को चिह्नित करते हुए, जलवायु-अनुकूल अभ्यासों के अंगीकरण को बढ़ावा देने के लिये साधनों एवं ऋण सहायता के रूप में प्रत्यक्ष प्रोत्साहन प्रदान करना अनिवार्य है। मौजूदा नीतियों में कार्बन सिंक के विस्तार एवं संरक्षण को उल्लेखनीय रूप से प्रोत्साहित करने के लिये लक्षित साधनों का अभाव है।
    • कार्बन क्रेडिट और बैंकों का उपयोग करना: किसानों को वैश्विक रूप से व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट देकर पुरस्कृत करना और कार्बन बैंक स्थापित करना कार्बन पृथक्करण प्रयासों को प्रोत्साहित कर सकता है। ये तंत्र उत्सर्जन ऑफसेट चाहने वाले निगमों को क्रेडिट की बिक्री की सुविधा प्रदान कर सकते हैं और इस प्रकार संवहनीय भूमि प्रबंधन को बढ़ावा दे सकते हैं।
    • सामूहिक सहभागिता: कार्बन फार्मिंग हेतु एक सफल ढाँचे के लिये सुसंगत नीतियों, सार्वजनिक-निजी सहयोग, परिशुद्ध मात्रा निर्धारण विधियों और सहायक वित्तपोषण तंत्र की आवश्यकता होगी। मृदा स्वास्थ्य एवं प्रत्यास्थता को सुनिश्चित करते हुए मापनीय कार्बन कैप्चर की प्राप्ति के लिये ‘स्केलेबल’ स्तर पर कार्यान्वयन महत्त्वपूर्ण है।
    • मृदा की क्षमता को साकार करना: मृदा (जो जलवायु रक्षा में उपेक्षित रही है) एक प्रभावशाली कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती है। भारत को शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों (Net Zero goals) की प्राप्ति के लिये और ‘डीकार्बोनाइज़ेशन’ को आगे बढ़ाने के लिये अपनी क्षमता का दोहन करना चाहिये।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top