Current Affairs For India & Rajasthan | Notes for Govt Job Exams

उत्तर : महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में स्थित अजंता गुफाओं में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से सातवीं शताब्दी तक के चित्र पाए जाते हैं। बौद्ध भिक्षुओं के निवास स्थान के रूप में निर्माण होने के कारण इन चित्रों की प्रकृति मुख्यत: धार्मिक है। अजंता चित्रकारी की प्रमुख विशेषताएँ धार्मिक प्रकृति होने के कारण अजंता गुफाओं के चित्रों के प्रमुख विषय भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाएँ, जातक और अवदान कथाओं के प्रसंग, जैसे- सिंहल अवदान, महाजनक जातक और विधुर पंडित जातक है। दंत जातक कथा आरंभिक काल की गुफा संख्या-10 पर विस्तारपूर्वक चित्रित की गई है। अजंता के चित्रों में अनेक शैली तथा प्रकारगत अंतर विद्यमान हैं, जैसे- गुफा संख्या-17 के चित्र। ईसा की पाँचवीं शताब्दी के अजंता चित्रों में बाहर की ओर प्रक्षेप दिखलाया गया है। इनमें स्पष्ट रेखांकन एवं लयबद्धता देखने को मिलती है। अजंता गुफा के चित्रों में विभिन्न रंगों के मिश्रण से त्वचा के लिये विभिन्न रंगों, जैसे- भूरा, पीलापन लिये भूरा, हरा एवं पीला आदि का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के उदाहरण गुफा संख्या 16, 17, 1 एवं 2 के चित्रों में आसानी से देखे जा सकते हैं। त्रिआयामी प्रभाव अंजता के चित्रों की अन्य प्रमुख विशेषता है। गुफा संख्या 1 और 2 में आकृतियों को त्रिआयामी बनाने हेतु एवं विशेष प्रभाव लाने के लिये गोलाकार संयोजन का प्रयोग किया गया है। गुफा संख्या-9 और 10 में भौगोलिक स्थान के अनुसार घटनाओं को समूहबद्ध किया गया है, जैसे- जंगल में घटित घटनाओं को राजमहल की घटनाओं से पृथक् दिखाना। अजंता के चित्रों की साँची की मूर्तिकला से समानता दिखती है। मूर्तिकला एवं चित्रकला की प्रक्रिया का साथ-साथ चलना इन चित्रों की प्रमुख विशेषता है, जैसे- पगड़ियों की आगे की गाँठ का मूर्तियों के समान ही चित्रण है। भारतीय चित्रकला पर प्रभाव अजंता में ‘शुष्क फ्रेस्को’ तकनीक से धार्मिक विषयों पर चित्रकारी की गई, जो आगामी समय में एलोरा, ऐलिफेंटा एवं बादामी की गुहा स्थापत्य; पल्लव, चोल, विजयनगर शासकों के मंदिर स्थापत्य और केरल के भित्ति चित्रों में देखी जा सकती है। इनमें व्यापक रूप में बौद्ध, जैन तथा हिंदू पौराणिक विषयों पर आधारित भित्ति चित्रों का चित्रण किया गया। अजंता गुहा भित्ति चित्रों ने आधुनिक काल के भारतीय चित्रकारों को भी प्रभावित किया, जैसे- अवनींद्रनाथ टैगोर, अमृता शेरगिल और नंदलाल बसु ने अजंता चित्रकारी से पर्याप्त प्रेरणा ग्रहण की। इस प्रकार अजंता गुफा के भित्ति चित्र अपनी तकनीक, संयोजन एवं विषयों के आधार पर भारतीय चित्रकला का प्रारंभिक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। इसने आगामी समय में होने वाले भारतीय चित्रकला के विकास को प्रेरणा प्रदान कर, उसे व्यापक रूप में प्रभावित किया।

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उत्तर :

 

200 ई. पूर्व के आस-पास से ही पश्चिमोत्तर भारत में मौर्यों के स्थान पर मध्य एशिया से आए कई राजवंशों ने अपना शासन जमाया। ये राजवंश हिंद-यूनानी, शक, पल्लव और कुषाण थे। मध्य एशिया से संपर्क के फलस्वरूप तत्कालीन भारतीय सामाजिक और धार्मिक संरचना में कई नवीन तत्त्वों के समावेश होने के कारण यह समय भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

भारतीय सामाजिक विकास में योगदान

  • भारतीय समाज से इन विदेशियों का आत्मसात हुआ और वे शनै: शनै: भारतीय बन गए। वे अंतत: अपनी पहचान खो बैठे।
  • कुषाणों ने भारतीय समाज को लाल-पॉलिशदार मृदभांड, ईंटों के कुएँ व फुहारों तथा टोंटियों वाले पात्रों से अवगत कराया।
  • शकों और कुषाणों ने भारतीय समाज में अश्वारोह की परंपरा चलाई तथा लगाम और जीन का प्रयोग प्रचलित किया।
  • शकों और कुषाणों ने भारतीय समाज में पगड़ी, ट्यूनिक, पायजामा और लंबे कोट का भी प्रचलन शुरू किया। अफगानी और पंजाबी लोग आज भी पगड़ी पहनते हैं।
  • कुषाणों ने रेशम मार्ग पर नियंत्रण कर व्यापार में वृद्धि की, सोने के सिक्के चलाए तथा खेती को बढ़ावा दिया। इनसे तत्कालीन भारतीय समाज का खूब विकास हुआ।
  • कुषाण काल में विभिन्न शैलियों और प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों तथा अन्य कारीगरों को एकत्रित करने से तत्कालीन भारत में गांधार व मथुरा कलाओं का विकास हुआ।
  • विदेशियों के साथ संपर्क ने तत्कालीन भारतीय समाज में साहित्य और विद्या को भी समृद्ध किया, जैसे- विदेशी राजाओं द्वारा संस्कृत साहित्य का संरक्षण एवं संपोषण, कुषाणों द्वारा अश्वघोष जैसे महान साहित्यकारों का संरक्षण, बौद्ध अवदानों की रचना आदि।
  •  मौर्योत्तर काल में भारतीय समाज में यूनानियों से संपर्क के फलस्वरूप खगोल और ज्योतिषशास्त्र में खूब प्रगति हुई।

मध्य एशिया से सपंर्क एवं धार्मिक विकास

  • इस समय कई विदेशी शासक विष्णु के उपासक बन गए। यूनानी राजदूत हिलियोदोरस ने मध्य प्रदेश स्थित विदिशा में ईसा पूर्व लगभग दूसरी सदी के मध्य पशुदेव की अराधना के लिये एक स्तंभ खड़ा किया।
  • कई विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को अपनाया, जैसे- यूनानी राजा मिनांदर नागसेन से प्रश्नोत्तर के पश्चात् बौद्ध हो गया।
  • कुषाण शासक शिव और बुद्ध दोनों के उपासक हैं और तद्नुसार कुषाण मुद्राओं पर हम इन दोनों देवताओं के चित्र पाते हैं।
  • इस काल में मध्य एशिया से भारी संख्या में नए-नए लोगों के आगमन और नगरों में व्यापारियों एवं शिल्पियों के जमाव से बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों का अनुशासन शिथिल हो गया और बौद्ध धर्म के नवीन रूप महायान का विकास हुआ।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि 500 वर्षों की इस मौर्योत्तर काल की अवधि में मध्य एशिया से संपर्क के परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक संरचना में कई नवीन तत्त्वों का समावेश हुआ तथा साथ ही पूर्व प्रचलित कई सामाजिक-धार्मिक नियमों का रूप परिवर्तित हुआ। इस कारण यह ऐतिहासिक अवधि तत्कालीन भारतीय सामाजिक-धार्मिक इतिहास की पुनर्रचना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

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