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अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

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हिंद महासागर क्षेत्र  में भारत की सुरक्षा के लिये अंडमान और निकोबार द्वीप समूह रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इस द्वीप समूह को रक्षा उद्देश्यों के लिये और इसकी आर्थिक क्षमता में सुधार के लिये विकसित किया जाना आवश्यक है। इस विकास कार्य में इन द्वीपों की अनूठी पारिस्थितिकी और स्वदेशी जनजातियों के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

निकोबार द्वीप का समग्र विकास’ (Holistic Development of Great Nicobar Island) नामक प्रस्तावित मेगा-प्रोजेक्ट ने एक बहस छेड़ दी है। पर्यावरणविदों को भय है कि यह द्वीप की अनूठी पारिस्थितिकी को नष्ट कर सकता है और शोम्पेन (Shompen) जनजाति को हानि पहुँचा सकता है। द्वीप के दूरस्थ अवस्थित होने के कारण परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता के बारे में भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। इस प्रकार, ऐसी समग्र विकास योजनाओं की आवश्यकता है जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की प्रगति तथा पर्यावरणीय एवं सामाजिक कल्याण दोनों को प्राथमिकता देती हों।

भारत के लिये अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का क्या महत्त्व है?

  • पूर्व का संरक्षक (‘Guardian of the East’): ये द्वीप भारतीय मुख्य भूमि से लगभग 1,300 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित हैं, जो भारत को बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में अत्यंत महत्त्वपूर्ण अग्रिम उपस्थिति प्रदान करता है।
    • यह अवस्थिति भारत को प्रमुख समुद्री चेकपॉइंट (विशेष रूप से मलक्का जलडमरूमध्य) की निगरानी करने और संभावित नियंत्रण रखने की अनुमति देती है।
      • इन द्वीपों की अवस्थिति भारत को क्षेत्र में नौसैनिक गतिविधियों, नौवहन यातायात और संभावित सुरक्षा संबंधी खतरों पर नज़र रखने में सक्षम बनाती है, जिससे समुद्री क्षेत्र जागरूकता की वृद्धि होती है।
  • नौसैनिक शक्ति का प्रदर्शन: ये द्वीप पूर्व से संभावित खतरों के विरुद्ध भारत की प्रथम रक्षा पंक्ति के रूप में कार्य करते हैं ।
    • ये द्वीप भारत को पूर्वी हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में नौसैनिक शक्ति को प्रदर्शित करने के लिये आधार प्रदान करते हैं, जो इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति (जैसे श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में) के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है।
  • आर्थिक क्षेत्र का विस्तार: ये द्वीप UNCLOS के तहत भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र और महाद्वीपीय शेल्फ का उल्लेखनीय विस्तार करते हैं, जिससे विशाल समुद्री संसाधनों और समुद्र के नीचे के खनिजों तक पहुँच प्राप्त होती है।
  • स्वदेशी जनजातियों का घर: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शोम्पेन जैसी विभिन्न स्वदेशी जनजातियों का घर है, जो हज़ारों वर्षों से इन द्वीपों पर निवास कर रहे हैं।
    • उनकी अनूठी संस्कृति एवं जीवनशैली द्वीप की पहचान का अभिन्न अंग हैं और उन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिये।
  • त्रि-सेवा कमान: वर्ष 2001 में स्थापित अंडमान और निकोबार कमान (ANC) वर्तमान में भारत की एकमात्र त्रि-सेवा थियेटर कमान है।
    • यह एकीकृत परिचालन के लिये एक मॉडल के रूप में कार्य करता है और क्षेत्र में भविष्य में होने वाले किसी भी संघर्ष में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।
  • पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण: इन द्वीपों के अछूते समुद्र तट, प्रवाल भित्तियाँ और अद्वितीय वन्य जीवन पारिस्थितिकी पर्यटन (eco-tourism) के लिये अपार संभावनाएँ प्रदान करते हैं। इससे राजस्व उत्पन्न हो सकता है, रोज़गार सृजित हो सकते हैं और समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
  • समुद्री व्यापार के लिये क्षमताशील केंद्र: ग्रेट निकोबार द्वीप में गैलेथिया खाड़ी का एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह के रूप में विकास किया जा रहा है जो इन द्वीपों को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिये एक महत्त्वपूर्ण केंद्र में बदल सकता है और ये सिंगापुर जैसे बंदरगाहों को प्रतिस्पर्द्धा दे सकते हैं।

 

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास: ये द्वीप अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के घर हैं।
    • पर्यावरण संरक्षण के साथ सामरिक एवं आर्थिक विकास की आवश्यकता को संतुलित करना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।
    • उदाहरण के लिये, गैलेथिया खाड़ी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह के विकास से लेदरबैक कछुओं के नेस्टिंग स्थलों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • स्वदेशी जनजातियों के लिये खतरा: विकास कार्य के साथ-साथ जारवा, ओंज और सेंटिनली जैसी स्वदेशी जनजातियों की संस्कृति एवं अधिकारों को संरक्षित करना जटिल है।
    • आलोचकों का तर्क है कि द्वीपों का विकास प्रायः इन जनजातियों की सुरक्षा करने वाले कानूनों [जैसे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956] के साथ टकराव में रहता है।
  • अवसंरचना विकास में बाधाएँ: इन द्वीपों की दूरस्थ स्थिति, कठिन भूभाग और नियमित रूप से भूकंपीय गतिविधियाँ अवसंरचना के विकास के लिये महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ पेश करती हैं।
    • इसमें स्रोत सामग्री, कुशल श्रम की खोज और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध अवसंरचनात्मक प्रत्यास्थता सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और समुद्र का बढ़ता स्तर: निम्नस्थ द्वीप (low-lying islands) होने के कारण ये जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
    • समुद्र का बढ़ता स्तर अवसंरचना और स्वदेशी समुदायों दोनों के लिये खतरा उत्पन्न करता है, जिसके लिये दीर्घकालिक अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता है।
  • निगरानी नेटवर्क में अंतराल: द्वीपों की महत्त्वपूर्ण सामरिक/रणनीतिक स्थिति के बावजूद, इस ओर निगरानी नेटवर्क में महत्त्वपूर्ण अंतराल मौजूद हैं।
    • विशाल समुद्री विस्तार (उत्तर से दक्षिण तक 780 किमी) के लिये रडार स्टेशनों, UAVs और समुद्री गश्ती विमानों के एक परिष्कृत नेटवर्क की आवश्यकता है, जो वर्तमान में अपर्याप्त है।
    • इस परिदृश्य से ‘सिक्स डिग्री चैनल’ जैसे महत्त्वपूर्ण चेकपॉइंट्स की निगरानी में भेद्यताएँ उत्पन्न होती हैं।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से संबंधित भारत सरकार की प्रमुख पहलें

  • ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास
  • अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह तक सबमेरिन केबल कनेक्टिविटी (CANI)
  • पोर्ट ब्लेयर स्मार्ट सिटी परियोजना

कौन-सी रणनीतियाँ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में संतुलित विकास सुनिश्चित कर सकती हैं?

  • स्वदेशी ज्ञान एकीकरण केंद्र: स्वदेशी ज्ञान एकीकरण केंद्र (Indigenous Knowledge Integration Center ) के रूप में एक ऐसा केंद्र स्थापित किया जाए जो स्वदेशी जनजातियों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ता हो।
    • इससे हर्बल औषधि, संवहनीय वानिकी और जलवायु-प्रत्यास्थी कृषि जैसे क्षेत्रों में सफलता प्राप्त हो सकती है, साथ ही स्वदेशी संस्कृतियों का संरक्षण एवं सम्मान भी हो सकता है।
  • ‘मेरीटाइम स्टार्टअप इनक्यूबेटर’: समुद्री प्रौद्योगिकियों, महासागर संरक्षण और सतत द्वीप विकास पर ध्यान केंद्रित करने वाले स्टार्टअप के लिये एक विशेष इनक्यूबेटर का सृजन किया जाए।
    • इससे प्रतिभा एवं निवेश आकर्षित हो सकता है और समुद्री रोबोटिक्स, महासागर सफाई प्रौद्योगिकियों एवं संवहनीय मत्स्यग्रहण विधियों जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
  • राजनयिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के द्वीप समूह: राजनयिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिये कुछ द्वीपों को अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र के रूप में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
    • क्षेत्रीय सहयोग के लिये एक अनूठे ‘आइलैंड-हॉपिंग’ (island-hopping) शिखर सम्मेलन प्रारूप का निर्माण किया जाए, जिसमें उच्चस्तरीय बैठकों को गहन सांस्कृतिक अनुभवों के साथ संयोजित करना शामिल है।
  • ब्लॉकचेन-आधारित संसाधन प्रबंधन: मत्स्यग्रहण कोटे से लेकर भूमि उपयोग तक, द्वीपों के संसाधनों के प्रबंधन के लिये ब्लॉकचेन-आधारित प्रणाली को लागू किया जाए।
    • इससे पारदर्शी, कुशल और संवहनीय संसाधन आवंटन सुनिश्चित हो सकेगा, साथ ही अन्य द्वीपीय देशों के लिये एक मॉडल प्रस्तुत किया जा सकेगा।
  • स्वायत्त समुद्री रक्षा नेटवर्क: रक्षा और निगरानी के लिये जल के नीचे एवं सतह पर चलने वाले स्वायत्त वाहनों का नेटवर्क विकसित किया जाए। यह बिना किसी बड़ी मानवीय उपस्थिति के सुरक्षा को उन्नत बना सकता है और AI-संचालित समुद्री रक्षा प्रणालियों के लिये एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है।
  • जनजातीय विरासत संरक्षक: एक ‘सांस्कृतिक अभयारण्य क्षेत्र’ (Cultural Sanctuary Zones) का शुभारंभ किया जाए जहाँ जनजातियाँ निर्बाध रूप से रह सकें।
    • संपर्क को न्यूनतम करते हुए आय उत्पन्न करने के लिये कड़ाई से विनियमित पारिस्थितिकी पर्यटन के साथ ‘बफ़र ज़ोन’ का विकास किया जाए।
    • स्वदेशी समुदायों के कल्याण के समर्थन हेतु विकास राजस्व से एक ‘जनजातीय विरासत कोष’ (Tribal Heritage Fund) का निर्माण किया जाए।
    • स्वदेशी क्षेत्रों के निकट किसी भी परियोजना के लिये ‘जनजातीय सहमति प्रोटोकॉल’ (Tribal Consent Protocol ) को लागू किया जाए।
  • अपशिष्ट प्रबंधन के लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अपशिष्ट प्रबंधन के लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण को लागू किया जाए, जहाँ अपशिष्ट नए उत्पादों के लिये संसाधन बन जाता है।
    • इसमें जैविक कचरे को उर्वरक में बदलने के लिये कम्पोस्ट सुविधाएँ स्थापित करना, प्लास्टिक कचरे को निर्माण सामग्री में बदलना और कचरे को जैव ईंधन में बदलने के लिये अभिनव जैव रूपांतरण प्रौद्योगिकियों की खोज करना शामिल हो सकता है।
  • सतत् पाककला पहल (Sustainable Gastronomy Initiative): द्वीपों में खाद्य के लिये ‘फार्म टू टेबल’ दृष्टिकोण की तर्ज पर ‘ओशन टू टेबल’ दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाए।
    • यह पहल न केवल पर्यटन अनुभव को बढ़ाएगी बल्कि सतत खाद्य अभ्यासों को भी बढ़ावा देगी और स्थानीय आजीविका का समर्थन करेगी।
  • अंडरवाटर रिसर्च और इनोवेशन हब: इन द्वीपों को विश्वस्तरीय समुद्री विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र में रूपांतरित किया जाए।
    • गहन समुद्र पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करने, नील जैव प्रौद्योगिकी (Blue Biotechnology) का विकास करने और संवहनीय जलकृषि तकनीकों में अग्रणी बनने के लिये अंडरवाटर अनुसंधान केंद्र एवं प्रयोगशालाएँ स्थापित की जाएँ।
    • इससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आकर्षित हो सकता है और भारत समुद्री विज्ञान में अग्रणी स्थिति प्राप्त कर सकता है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा परीक्षण केंद्र: अत्याधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिये परीक्षण केंद (Testbed ) के निर्माण हेतु इन द्वीपों की अद्वितीय भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाया जाए।
    • ज्वारीय ऊर्जा, अपतटीय पवन फार्मों और समुद्री सौर पैनलों के साथ प्रयोग से न केवल ये द्वीप ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनेंगे, बल्कि मुख्य भूमि भारत और पड़ोसी देशों को स्वच्छ ऊर्जा का निर्यात भी कर सकेंगे।
  • पारिस्थितिकी पर्यटन अंतरिक्ष प्रक्षेपण स्थल: एक वाणिज्यिक अंतरिक्ष प्रक्षेपण सुविधा विकसित की जाए जो पारिस्थितिकी पर्यटन स्थल के रूप में भी कार्य कर सके।
    • इन द्वीपों की भूमध्यरेखीय अवस्थिति उपग्रह प्रक्षेपण के लिये आदर्श है, जबकि यह सुविधा पर्यटकों को प्रक्षेपण देखने, अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशालाओं में भाग लेने और द्वीप की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने का भी अवसर प्रदान कर सकती है।

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